Sad Poetry (page 348)
दश्त में उस का आब-ओ-दाना है
आबिद मलिक
आसूदगान-ए-हिज्र से मिलने की चाह में
आबिद मलिक
आख़िरी बार ज़माने को दिखाया गया हूँ
आबिद मलिक
था मुख़्तसर वजूद जसीम-ओ-जरी न थी
आबिद काज़मी
जिन्हें था फ़ख़्र नवाब-ओ-नजीब होते हैं
आबिद काज़मी
ज़र्द मौसम की हवाओं में खड़ा हूँ मैं भी
आबिद करहानी
दश्त में छाँव कोई ढूँड निकाली जाए
आबिद करहानी
ज़मीं से चल के तो पहुँचा हूँ आसमाँ तक मैं
आबिद हशरी
श्याम गोकुल न जाना कि राधा का जी अब न बंसी की तानों पे लहराएगा
आबिद हशरी
न कर्ब-ए-हिज्र न कैफ़्फ़ियत-ए-विसाल में हूँ
आबिद हशरी
शिकस्त
आबिद आलमी
रात
आबिद आलमी
अजनबी
आबिद आलमी
वो जो हर राह के हर मोड़ पर मिल जाता है
आबिद आलमी
तुम ने जब घर में अंधेरों को बुला रक्खा है
आबिद आलमी
तुम ने जब घर में अँधेरों को बुला रक्खा है
आबिद आलमी
क्या ख़बर कब से प्यासा था सहरा
आबिद आलमी
किसी मक़ाम पे हम को भी रोकता कोई
आबिद आलमी
जो शख़्स तुझ को फ़रिश्ता दिखाई देता है
आबिद आलमी
दे गया आख़िरी सदा कोई
आबिद आलमी
जो कहते हैं किधर दीवानगी है
आबिद अख़्तर
अपनी कमी से पूछ न उस की कमी से पूछ
आबिद अख़्तर
वहाँ पहले ही आवाज़ें बहुत थीं
अभिषेक शुक्ला
मैं चोट कर तो रहा हूँ हवा के माथे पर
अभिषेक शुक्ला
सुर्ख़ सहर से है तो बस इतना सा गिला हम लोगों का
अभिषेक शुक्ला
सफ़र के बा'द भी ज़ौक़-ए-सफ़र न रह जाए
अभिषेक शुक्ला
लहर का ख़्वाब हो के देखते हैं
अभिषेक शुक्ला
ख़ला के जैसा कोई दरमियान भी पड़ता
अभिषेक शुक्ला
हम ऐसे सोए भी कब थे हमें जगा लाते
अभिषेक शुक्ला
फ़सील-ए-जिस्म गिरा दे मकान-ए-जाँ से निकल
अभिषेक शुक्ला