Sad Poetry (page 356)

बे-सबब क्यूँ तबाह होता है

अब्दुल हमीद अदम

बहुत से लोगों को ग़म ने जिला के मार दिया

अब्दुल हमीद अदम

अरे मय-गुसारो सवेरे सवेरे

अब्दुल हमीद अदम

ऐ साक़ी-ए-मह-वश ग़म-ए-दौराँ नहीं उठता

अब्दुल हमीद अदम

अब दो-आलम से सदा-ए-साज़ आती है मुझे

अब्दुल हमीद अदम

आता है कौन दर्द के मारों के शहर में

अब्दुल हमीद अदम

आज फिर रूह में इक बर्क़ सी लहराती है

अब्दुल हमीद अदम

आगही में इक ख़ला मौजूद है

अब्दुल हमीद अदम

ज़वाल-ए-जिस्म को देखो तो कुछ एहसास हो इस का

अब्दुल हमीद

ये क़ैद है तो रिहाई भी अब ज़रूरी है

अब्दुल हमीद

बरसते थे बादल धुआँ फैलता था अजब चार जानिब

अब्दुल हमीद

उसे देख कर अपना महबूब प्यारा बहुत याद आया

अब्दुल हमीद

साए फैल गए खेतों पर कैसा मौसम होने लगा

अब्दुल हमीद

पाँव रुकते ही नहीं ज़ेहन ठहरता ही नहीं

अब्दुल हमीद

कुछ अपना पता दे कर हैरान बहुत रक्खा

अब्दुल हमीद

कितनी महबूब थी ज़िंदगी कुछ नहीं कुछ नहीं

अब्दुल हमीद

किसी का क़हर किसी की दुआ मिले तो सही

अब्दुल हमीद

किसी दश्त ओ दर से गुज़रना भी क्या

अब्दुल हमीद

कभी देखो तो मौजों का तड़पना कैसा लगता है

अब्दुल हमीद

तुम्हारे संग-ए-तग़ाफ़ुल का क्यूँ करें शिकवा

अब्दुल हफ़ीज़ नईमी

खड़ा हुआ हूँ सर-ए-राह मुंतज़िर कब से

अब्दुल हफ़ीज़ नईमी

हुस्न इक दरिया है सहरा भी हैं उस की राह में

अब्दुल हफ़ीज़ नईमी

इस तिलिस्म-ए-रोज़-ओ-शब से तो कभी निकलो ज़रा

अब्दुल हफ़ीज़ नईमी

होंकते दश्त में इक ग़म का समुंदर देखो

अब्दुल हफ़ीज़ नईमी

हर इंसाँ अपने होने की सज़ा है

अब्दुल हफ़ीज़ नईमी

ग़ुबार-ए-दर्द से सारा बदन अटा निकला

अब्दुल हफ़ीज़ नईमी

गर्द-ए-फ़िराक़ ग़ाज़ा कश-ए-आइना न हो

अब्दुल हफ़ीज़ नईमी

दुआ को हाथ मिरा जब कभी उठा होगा

अब्दुल हफ़ीज़ नईमी

बहार बन के ख़िज़ाँ को न यूँ दिलासा दे

अब्दुल हफ़ीज़ नईमी

फिर रग-शो'ला-ए-जाँ-सोज़ में नश्तर गुज़रा

अब्दुल हादी वफ़ा