Sad Poetry (page 359)
जब तक शब्द के दीप जलेंगे सब आएँगे तब तक यार
अब्दुल अहद साज़
जाने क़लम की आँख में किस का ज़ुहूर था
अब्दुल अहद साज़
हम अपने ज़ख़्म कुरेदते हैं वो ज़ख़्म पराए धोते थे
अब्दुल अहद साज़
हिसार-ए-दीद में जागा तिलिस्म-ए-बीनाई
अब्दुल अहद साज़
हर इक लम्हे की रग में दर्द का रिश्ता धड़कता है
अब्दुल अहद साज़
हद-ए-उफ़ुक़ पर सारा कुछ वीरान उभरता आता है
अब्दुल अहद साज़
घुल सी गई रूह में उदासी
अब्दुल अहद साज़
इक ईमा इक इशारा मर रहा है
अब्दुल अहद साज़
दूर से शहर-ए-फ़िक्र सुहाना लगता है
अब्दुल अहद साज़
दिखाई देने के और दिखाई न देने के दरमियान सा कुछ
अब्दुल अहद साज़
बुझ गई आग तो कमरे में धुआँ ही रखना
अब्दुल अहद साज़
बे-मसरफ़ बे-हासिल दुख
अब्दुल अहद साज़
बंद फ़सीलें शहर की तोड़ें ज़ात की गिरहें खोलें
अब्दुल अहद साज़
बजा कि पाबंद-ए-कूचा-ए-नाज़ हम हुए थे
अब्दुल अहद साज़
बजा कि पाबंद-ए-कूचा-ए-नाज़ हम हुए थे
अब्दुल अहद साज़
बजा कि लुत्फ़ है दुनिया में शोर करने का
अब्दुल अहद साज़
बहुत मलूल बड़े शादमाँ गए हुए हैं
अब्दुल अहद साज़
बद-सोहबतों को छोड़ शरीफ़ों के साथ घूम
अब्दुल अहद साज़
अज़दवाजी ज़िंदगी भी और तिजारत भी अदब भी
अब्दुल अहद साज़
अबस है राज़ को पाने की जुस्तुजू क्या है
अब्दुल अहद साज़
आज फिर शब का हवाला तिरी जानिब ठहरे
अब्दुल अहद साज़
वर्ना कोई कब गालियाँ देता है किसी को
अब्बास ताबिश
तेरी रूह में सन्नाटा है और मिरी आवाज़ में चुप
अब्बास ताबिश
सुन रहा हूँ अभी तक मैं अपनी ही आवाज़ की बाज़गश्त
अब्बास ताबिश
रात को जब याद आए तेरी ख़ुशबू-ए-क़बा
अब्बास ताबिश
रात कमरे में न था मेरे अलावा कोई
अब्बास ताबिश
पस-ए-ग़ुबार भी उड़ता ग़ुबार अपना था
अब्बास ताबिश
निहाल-ए-दर्द ये दिन तुझ पे क्यूँ उतरता नहीं
अब्बास ताबिश
न ख़्वाब ही से जगाया न इंतिज़ार किया
अब्बास ताबिश
मेरा रंज-ए-मुस्तक़िल भी जैसे कम सा हो गया
अब्बास ताबिश