Sad Poetry (page 361)
पाँव पड़ता हुआ रस्ता नहीं देखा जाता
अब्बास ताबिश
मेरी तन्हाई बढ़ाते हैं चले जाते हैं
अब्बास ताबिश
मिरे बदन में लहू का कटाव ऐसा था
अब्बास ताबिश
मैं अपने इश्क़ को ख़ुश-एहतिमाम करता हुआ
अब्बास ताबिश
कुंज-ए-ग़ज़ल न क़ैस का वीराना चाहिए
अब्बास ताबिश
खा के सूखी रोटियाँ पानी के साथ
अब्बास ताबिश
कस कर बाँधी गई रगों में दिल की गिरह तो ढीली है
अब्बास ताबिश
झिलमिल से क्या रब्त निकालें कश्ती की तक़दीरों का
अब्बास ताबिश
जहान-ए-मर्ग-ए-सदा में इक और सिलसिला ख़त्म हो गया है
अब्बास ताबिश
इतना आसाँ नहीं मसनद पे बिठाया गया मैं
अब्बास ताबिश
इश्क़ की जोत जगाने में बड़ी देर लगी
अब्बास ताबिश
हम ने चुप रह के जो एक साथ बिताया हुआ है
अब्बास ताबिश
हर-चंद तिरी याद जुनूँ-ख़ेज़ बहुत है
अब्बास ताबिश
फ़क़त माल-ओ-ज़र-ए-दीवार-ओ-दर अच्छा नहीं लगता
अब्बास ताबिश
एक मुश्किल सी बहर-तौर बनी होती है
अब्बास ताबिश
डूब कर भी न पड़ा फ़र्क़ गिराँ-जानी में
अब्बास ताबिश
दी है वहशत तो ये वहशत ही मुसलसल हो जाए
अब्बास ताबिश
दश्त-ए-हैरत में सबील-ए-तिश्नगी बन जाइए
अब्बास ताबिश
दश्त में प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं
अब्बास ताबिश
दर-ए-उफ़ुक़ पे रक़म रौशनी का बाब करें
अब्बास ताबिश
चश्म-ए-नम-दीदा सही ख़ित्ता-ए-शादाब मिरा
अब्बास ताबिश
चराग़-ए-सुब्ह जला कोई ना-शनासी में
अब्बास ताबिश
चाँद को तालाब मुझ को ख़्वाब वापस कर दिया
अब्बास ताबिश
चाँद का पत्थर बाँध के तन से उतरी मंज़र-ए-ख़्वाब में चुप
अब्बास ताबिश
बहुत बे-कार मौसम है मगर कुछ काम करना है
अब्बास ताबिश
बदन के चाक पर ज़र्फ़-ए-नुमू तय्यार करता हूँ
अब्बास ताबिश
अजीब तौर की है अब के सरगिरानी मिरी
अब्बास ताबिश
ऐसे तो कोई तर्क सुकूनत नहीं करता
अब्बास ताबिश
अब परिंदों की यहाँ नक़्ल-ए-मकानी कम है
अब्बास ताबिश
अब मोहब्बत न फ़साना न फ़ुसूँ है यूँ है
अब्बास ताबिश