ख्वाब Poetry (page 9)
तुम ने रस्मन मुझे सलाम किया
इफ़्तिख़ार राग़िब
दिन में आने लगे हैं ख़्वाब मुझे
इफ़्तिख़ार राग़िब
वो कहते हैं कि आँखों में मिरी तस्वीर किस की है
इफ़्तिख़ार राग़िब
दिन में आने लगे हैं ख़्वाब मुझे
इफ़्तिख़ार राग़िब
चश्म-ए-तर को ज़बान कर बैठे
इफ़्तिख़ार राग़िब
अच्छे दिनों की आस लगा कर मैं ने ख़ुद को रोका है
इफ़्तिख़ार राग़िब
अपने ख़ूँ को ख़र्च किया है और कमाया शहर
इफ़्तिख़ार क़ैसर
यूँ है तिरी तलाश पे अब तक यक़ीं मुझे
इफ़्तिख़ार नसीम
कोई वजूद है दुनिया में कोई परछाईं
इफ़्तिख़ार मुग़ल
किसी सबब से अगर बोलता नहीं हूँ मैं
इफ़्तिख़ार मुग़ल
कभी कभी तो ये हालत भी की मोहब्बत ने
इफ़्तिख़ार मुग़ल
जमाल-गाह-ए-तग़ज़्ज़ुल की ताब-ओ-तब तिरी याद
इफ़्तिख़ार मुग़ल
धुँद
इफ़्तेख़ार जालिब
वो ख़्वाब था बिखर गया ख़याल था मिला नहीं
इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी
जो चुप रहा तो वो समझेगा बद-गुमान मुझे
इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी
वो ख़्वाब था बिखर गया ख़याल था मिला नहीं
इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी
तिरे क़रीब रहूँ या कि दूर जाऊँ मैं
इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी
रौशनी की डोर थामे ज़िंदगी तक आ गए
इफ़्तिख़ार फलक काज़मी
मलबे से जो मिली हैं वो लाशें दिखाइए
इफ़्तिख़ार फलक काज़मी
आसाँ नहीं है जादा-ए-हैरत उबूरना
इफ़्तिख़ार फलक काज़मी
दश्त-ए-बे-सम्त में रुकना भी सफ़र ऐसा था
इफ़्तिख़ार बुख़ारी
वही है ख़्वाब जिसे मिल के सब ने देखा था
इफ़्तिख़ार आरिफ़
मैं अपने ख़्वाब से कट कर जियूँ तो मेरा ख़ुदा
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हमें भी आफ़ियत-ए-जाँ का है ख़याल बहुत
इफ़्तिख़ार आरिफ़
इक ख़्वाब ही तो था जो फ़रामोश हो गया
इफ़्तिख़ार आरिफ़
दिल कभी ख़्वाब के पीछे कभी दुनिया की तरफ़
इफ़्तिख़ार आरिफ़
बेटियाँ बाप की आँखों में छुपे ख़्वाब को पहचानती हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
बस एक ख़्वाब की सूरत कहीं है घर मेरा
इफ़्तिख़ार आरिफ़
रौशन दिल वालों के नाम
इफ़्तिख़ार आरिफ़