Islamic Poetry (page 52)
साफ़ बातों से हो गया मा'लूम
अरशद अली ख़ान क़लक़
नहीं चमके ये हँसने में तुम्हारे दाँत अंजुम से
अरशद अली ख़ान क़लक़
हुज़ूर-ए-ग़ैर तुम उश्शाक़ की तहक़ीर करते हो
अरशद अली ख़ान क़लक़
हम ने एहसान असीरी का न बर्बाद किया
अरशद अली ख़ान क़लक़
गर दिल में कर के सैर-ए-दिल-ए-दाग़-दार देख
अरशद अली ख़ान क़लक़
बुत-परस्ती ने किया आशिक़-ए-यज़्दाँ मुझ को
अरशद अली ख़ान क़लक़
बुत-परस्ती ने किया आशिक़-ए-यज़्दाँ मुझ को
अरशद अली ख़ान क़लक़
अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल का
अरशद अली ख़ान क़लक़
आश्ना होते ही उस इश्क़ ने मारा मुझ को
अरशद अली ख़ान क़लक़
आशिक़-ए-गेसू-ओ-क़द तेरे गुनहगार हैं सब
अरशद अली ख़ान क़लक़
आरिज़ में तुम्हारे क्या सफ़ा है
अरशद अली ख़ान क़लक़
आएँगे वो तो आप में हरगिज़ न आएँगे
अरशद अली ख़ान क़लक़
हम कि मायूस नहीं हैं उन्हें पा ही लेंगे
अर्श सिद्दीक़ी
संग-ए-दर उस का हर इक दर पे लगा मिलता है
अर्श सिद्दीक़ी
हंगामा-हा-ए-बादा-ओ-पैमाना देख कर
अर्श सहबाई
तौबा तौबा ये बला-ख़ेज़ जवानी तौबा
अर्श मलसियानी
दीवाली
अर्श मलसियानी
वो ले के हौसला-ए-अज़्म-ए-बे-पनाह चले
अर्श मलसियानी
पहला सा वो जुनून-ए-मोहब्बत नहीं रहा
अर्श मलसियानी
नैरंगी-ए-बहार-ओ-ख़िज़ाँ देखते रहे
अर्श मलसियानी
इश्क़-ए-बुताँ का ले के सहारा कभी कभी
अर्श मलसियानी
एहसास-ए-हुस्न बन के नज़र में समा गए
अर्श मलसियानी
दिल-ए-फ़सुर्दा पे सौ बार ताज़गी आई
अर्श मलसियानी
अगर तक़दीर तेरी बाइस-ए-आज़ार हो जाए
अर्श मलसियानी
हिना-रंग हाथों में
अरमान नज्मी
इक बे-निशान हर्फ़-ए-सदा की तरफ़ न देख
अरमान नज्मी
वो क्या मस्लहत थी
आरिफ़ा शहज़ाद
मुझ को वैसा ख़ुदा मिला बिल्कुल
आरिफ़ शफ़ीक़
तू ज़मीं पर है कहकशाँ जैसा
आरिफ़ शफ़ीक़
घर से चीख़ें उठ रही थीं और मैं जागा न था
आरिफ़ शफ़ीक़