लहू पुकारता है

लहू पुकारता है

हर तरफ़ पुकारता है

सहर हो, शाम हो, ख़ामोशी हो कि हंगामा

जुलूस-ए-ग़म हो कि बज़्म-ए-नशात-आराई

लहू पुकारता है

लहू पुकारता है जैसे ख़ुश्क सहरा में

पुकारा करते थे पैग़म्बरान-ए-इसराईल

ज़मीं के सीने से और आस्तीन-ए-क़ातिल से

गुलू-ए-कुश्ता से बेहिस ज़बान-ए-ख़ंजर से

सदा लपकती है हर सम्त हर्फ़-ए-हक़ की तरह

मगर वो कान जो बहरे हैं सुन नहीं सकते

मगर वो क़ल्ब जो संगीं हैं हिल नहीं सकते

कि उन में अहल-ए-हवस की सदा का सीसा है

वो झुकते रहते हैं लब-हा-ए-इक़तिदार की सम्त

वो सुनते रहते हैं बस हुक्म-ए-हाकिमान-ए-जहाँ

तवाफ़ करते हैं अर्बाब-ए-गी-ओ-दार के गिर्द

मगर लहू तो है बे-बाक ओ सरकश ओ चालाक

ये शोला मय के प्याले में जाग उठता है

लिबास-ए-अत्लस-ओ-दीबा में सरसराता है

ये दामनों को पकड़ता है शाह-राहों में

खड़ा हुआ नज़र आता है दाद-गाहों में

ज़मीं समेट न पाएगी उस की बाँहों में

छलक रहे हैं समुंदर सरक रहे हैं पहाड़

लहू पुकार रहा है लहू पुकारेगा

ये वो सदा है जिसे क़त्ल कर नहीं सकते

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