Couplets Poetry (page 239)
कौन इस रंग से जामे से हुआ था बाहर
नातिक़ गुलावठी
कश्ती है घाट पर तू चले क्यूँ न दूर आज
नातिक़ गुलावठी
कर मुरत्तब कुछ नए अंदाज़ से अपना बयाँ
नातिक़ गुलावठी
कैफ़ियत-ए-तज़ाद अगर हो न बयान-ए-शे'र में
नातिक़ गुलावठी
कहने वाले वो सुनने वाला मैं
नातिक़ गुलावठी
जुरअत-अफ़ज़ा-ए-सवाल ऐ ज़हे अंदाज़-ए-जवाब
नातिक़ गुलावठी
जो बला आती है आती है बला की 'नातिक़'
नातिक़ गुलावठी
जी चुराने की नहीं शर्त दिल-ए-ज़ार यहाँ
नातिक़ गुलावठी
इस ख़ाक-दान-ए-दहर में घुटता अगर है दम
नातिक़ गुलावठी
इंतिज़ाम-ए-रोज़-ए-इशरत और कर ऐ ना-मुराद
नातिक़ गुलावठी
हम तो मस्जिद से भी मायूस ही आए 'नातिक़'
नातिक़ गुलावठी
हम पाँव भी पड़ते हैं तो अल्लाह-रे नख़वत
नातिक़ गुलावठी
हम हैं तो न रक्खेंगे इतना तुझे अफ़्सुर्दा
नातिक़ गुलावठी
हो गई आवारागर्दी बे-घरी की पर्दा-दार
नातिक़ गुलावठी
हिचकियों पर हो रहा है ज़िंदगी का राग ख़त्म
नातिक़ गुलावठी
हाथ रहते हैं कई दिन से गरेबाँ के क़रीब
नातिक़ गुलावठी
हँस के नहीं तो रो के भी उम्र गुज़र ही जाएगी
नातिक़ गुलावठी
हंगामा-ए-हयात से लेना तो कुछ नहीं
नातिक़ गुलावठी
हाँ ये तो बता ऐ दिल-ए-महरूम-ए-तमन्ना
नातिक़ गुलावठी
हाँ जान तो देंगे मगर ऐ मौत अभी दम ले
नातिक़ गुलावठी
हमें कम-बख़्त एहसास-ए-ख़ुदी उस दर पे ले बैठा
नातिक़ गुलावठी
हमें जो याद है हम तो उसी से काम लेते हैं
नातिक़ गुलावठी
हमारे ऐब में जिस से मदद मिले हम को
नातिक़ गुलावठी
है मरज़ तो जो कुछ है थी दवा तो जैसी थी
नातिक़ गुलावठी
गुज़रती है मज़े से वाइ'ज़ों की ज़िंदगी अब तो
नातिक़ गुलावठी
गुल शोर कहाँ का है सुन तो सही ओ ज़ालिम
नातिक़ गुलावठी
घर बनाने की बड़ी फ़िक्र है दुनिया में हमें
नातिक़ गुलावठी
ग़म-ओ-अंदोह का लश्कर भी चला आता है
नातिक़ गुलावठी
इक हर्फ़-ए-शिकायत पर क्यूँ रूठ के जाते हो
नातिक़ गुलावठी
दूसरों को क्या कहिए दूसरी है दुनिया ही
नातिक़ गुलावठी