Couplets Poetry (page 238)
रस्म-ए-तलब में क्या है समझ कर उठा क़दम
नातिक़ गुलावठी
रक्खी हुई है सारी ख़ुदाई तिरे लिए
नातिक़ गुलावठी
रखता है तल्ख़-काम ग़म-ए-लज़्ज़त-ए-जहाँ
नातिक़ गुलावठी
रहती है शम्स-ओ-क़मर को तिरे साए की तलाश
नातिक़ गुलावठी
रह-नवरदान-ए-वफ़ा मंज़िल पे पहुँचे इस तरह
नातिक़ गुलावठी
रह के अच्छा भी कुछ भला न हुआ
नातिक़ गुलावठी
फिर चाक-दामनी की हमें क़द्र क्यूँ न हो
नातिक़ गुलावठी
पहुँचाएगा नहीं तू ठिकाने लगाएगा
नातिक़ गुलावठी
पहली बातें हैं न पहले की मुलाक़ातें हैं
नातिक़ गुलावठी
पाबंद-ए-दैर हो के भी भूले नहीं हैं घर
नातिक़ गुलावठी
नज़र आता नहीं अब घर में वो भी उफ़ रे तन्हाई
नातिक़ गुलावठी
नाज़ उधर दिल को उड़ा लेने की घातों में रहा
नातिक़ गुलावठी
न मय-कशी न इबादत हमारी आदत है
नातिक़ गुलावठी
मुझ से नाराज़ हैं जो लोग वो ख़ुश हैं उन से
नातिक़ गुलावठी
मुझ को मालूम हुआ अब कि ज़माना तुम हो
नातिक़ गुलावठी
मिले मुराद हमारी मगर मिले भी कहीं
नातिक़ गुलावठी
मिल गए तुम हाथ उठा कर मुझ को सब कुछ मिल गया
नातिक़ गुलावठी
मेरे सीने में नहीं है तो ये समझो कि न था
नातिक़ गुलावठी
मजनूँ से जो नफ़रत है दीवानी है तू लैला
नातिक़ गुलावठी
मय को मिरे सुरूर से हासिल सुरूर था
नातिक़ गुलावठी
लो जुनूँ की सवारी आ पहुँची
नातिक़ गुलावठी
क्या करूँ ऐ दिल-ए-मायूस ज़रा ये तो बता
नातिक़ गुलावठी
क्या इरादे हैं वहशत-ए-दिल के
नातिक़ गुलावठी
कुछ नहीं अच्छा तो दुनिया में बुरा भी कुछ नहीं
नातिक़ गुलावठी
किस को मेहरबाँ कहिए कौन मेहरबाँ अपना
नातिक़ गुलावठी
कीजिए कार-ए-ख़ैर में हाजत-ए-इस्तिख़ारा क्या
नातिक़ गुलावठी
खो दिया शोहरत ने अपनी शेर-ख़्वानी का मज़ा
नातिक़ गुलावठी
ख़त्म करना चाहता हूँ पेच-ओ-ताब-ए-ज़िंदगी
नातिक़ गुलावठी
खाइए ये ज़हर कब तक खाए जाती है ये ज़ीस्त
नातिक़ गुलावठी
खा गई अहल-ए-हवस की वज़्अ अहल-ए-इश्क़ को
नातिक़ गुलावठी