Couplets Poetry (page 237)
उन के लब पर ज़िक्र आया बे-हिजाबाना मेरा
नातिक़ लखनवी
मोहब्बत-आश्ना दिल मज़हब-ओ-मिल्लत को क्या जाने
नातिक़ लखनवी
मिरी जानिब से उन के दिल में किस शिकवे पे कीना है
नातिक़ लखनवी
मय-कशो मय की कमी बेशी पे नाहक़ जोश है
नातिक़ लखनवी
कह रहा है शोर-ए-दरिया से समुंदर का सुकूत
नातिक़ लखनवी
इब्तिदा से आज तक 'नातिक़' की ये है सरगुज़िश्त
नातिक़ लखनवी
इक दाग़-ए-दिल ने मुझ को दिए बे-शुमार दाग़
नातिक़ लखनवी
दो आलम से गुज़र के भी दिल-ए-आशिक़ है आवारा
नातिक़ लखनवी
दिल रहे या न रहे ज़ख़्म भरे या न भरे
नातिक़ लखनवी
दिल है किस का जिस में अरमाँ आप का रहता नहीं
नातिक़ लखनवी
ऐ शम्अ' तुझ पे रात ये भारी है जिस तरह
नातिक़ लखनवी
आज़ादियों का हक़ न अदा हम से हो सका
नातिक़ लखनवी
ज़िक्र-ए-शराब-ए-नाब पे वाइ'ज़ उखड़ गया
नातिक़ गुलावठी
ज़ाहिर न था नहीं सही लेकिन ज़ुहूर था
नातिक़ गुलावठी
ये ख़ुदा की शान तो देखिए कि ख़ुदा का नाम ही रह गया
नातिक़ गुलावठी
वहाँ से ले गई नाकाम बदबख़्तों को ख़ुद-कामी
नातिक़ गुलावठी
वफ़ा पर नाज़ हम को उन को अपनी बेवफ़ाई पर
नातिक़ गुलावठी
उसे पा-ब-गिल न रखता जो ख़याल-ए-तीरा-बख़्ती
नातिक़ गुलावठी
उम्र भर का साथ मिट्टी में मिला
नातिक़ गुलावठी
तुम्हारी बात का इतना है ए'तिबार हमें
नातिक़ गुलावठी
तुम ऐसे अच्छे कि अच्छे नहीं किसी के साथ
नातिक़ गुलावठी
तुम अगर जाओ तो वहशत मिरी खा जाए मुझे
नातिक़ गुलावठी
तो हमें कहता है दीवाना को दीवाने सही
नातिक़ गुलावठी
तरीक़-ए-दिलबरी काफ़ी नहीं हर-दिल-अज़ीज़ी को
नातिक़ गुलावठी
सुब्ह-ए-पीरी में फिरा शाम-ए-जवानी का गया
नातिक़ गुलावठी
शैख़ जज़ा-ए-कार-ए-ख़ैर जो बता रहा है आज
नातिक़ गुलावठी
सर से दयार-ए-ग़म के सनीचर उतार दे
नातिक़ गुलावठी
सब कुछ मुझे मुश्किल है न पूछो मिरी मुश्किल
नातिक़ गुलावठी
सब को ये शिकायत है कि हँसता नहीं 'नातिक़'
नातिक़ गुलावठी
रिया-कारी के सज्दे शैख़ ले बैठेंगे मस्जिद को
नातिक़ गुलावठी