Couplets Poetry (page 235)
वार हर एक मिरे ज़ख़्म का हामिल आया
नज़र जावेद
मिट्टी की आवाज़ सुनी जब मिट्टी ने
नज़र जावेद
अब बच के कहाँ जाए हर इक सम्त है दीवार
नज़र बर्नी
सीने पे कितने दाग़ लिए फिर रहा हूँ मैं
नय्यर सुल्तानपुरी
पहुँचा न था यक़ीन की मंज़िल पे मैं अभी
नय्यर सुल्तानपुरी
दी है 'नय्यर' मुझ को साक़ी ने ये कैसी ख़ास मय
नय्यर सुल्तानपुरी
बढ़ने लगी यक़ीन ओ गुमाँ में जो कश्मकश
नय्यर सुल्तानपुरी
उतनी देर समेटूँ सारे दुख तेरे
नईम गिलानी
मौत से आगे तक के मंज़र देखे हैं
नईम गिलानी
ये सारा क़ज़िया तो हम से है इस से तुम को क्या
नैन सुख
वो जो इक तोला कई माशा थी यारी तुम से
नैन सुख
साने' मिरा वो है कि हो कैसी ही चोब-ए-ख़ुश्क
नैन सुख
पूछे कोई किसी को सो इम्कान ही नहीं
नैन सुख
लोगों के फोड़ता फिरे शीशे
नैन सुख
किया अज़ल से है साने' ने बुत-परस्त मुझे
नैन सुख
जितना कि है इफ़रात तिरी कम-निगही का
नैन सुख
जावे भी फिर आवे भी कई शक्ल से हर बार
नैन सुख
इस माजरा को जा के कहूँ किस के रू-ब-रू
नैन सुख
ईधर से सेते जाओ और ऊधर से फटता जाए
नैन सुख
देखा है कहीं गुल ने तुझे जिस की ख़ुशी से
नैन सुख
चटपटी दिल की बुझी यार के देखे से यूँ
नैन सुख
और सब 'मानी' ने तेरी तो बनाई तस्वीर
नैन सुख
आईने से मुझ दल के तहय्युर को मिला देख
नैन सुख
आगे को बढ़ सके है न पीछे को हट सके
नैन सुख
जाने क्यूँ दोज़ख़ से बद-तर हो गए हालात आज
नवाब शाहाबादी
एहसास मुझ को इतना भी अब तो नहीं 'नवाब'
नवाब शाहाबादी
उस ने तो छीना था मेरे जिस्म से मेरा लिबास
नवाब अहसन
शब-ए-फ़िराक़ की तन्हाइयों में तेरा ख़याल
नवाब अहसन
ख़ौफ़-ओ-दहशत से लब नहीं खुलते
नवाब अहसन
जब भी लौटा गाँव के बाज़ार से
नवाब अहसन