Couplets Poetry (page 234)

गए थे मिलने को शायद झिड़क दिया उस ने

नज़ीर अकबराबादी

इक दम की ज़िंदगी के लिए मत उठा मुझे

नज़ीर अकबराबादी

दूर-अज़-तरीक़ मुझ को समझियो न ज़ाहिदा

नज़ीर अकबराबादी

दूर से आए थे साक़ी सुन के मय-ख़ाने को हम

नज़ीर अकबराबादी

दोस्तो क्या क्या दिवाली में नशात-ओ-ऐश है

नज़ीर अकबराबादी

दीवानगी मेरी के तहय्युर में शब-ओ-रोज़

नज़ीर अकबराबादी

दिल की बे-ताबी ठहरने नहीं देती मुझ को

नज़ीर अकबराबादी

दिल की बेताबी नहीं ठहरने देती है मुझे

नज़ीर अकबराबादी

देखेंगे हम इक निगाह उस को

नज़ीर अकबराबादी

देखे न मुझे क्यूँकर अज़-चश्म-ए-हिक़ारत-ऊ

नज़ीर अकबराबादी

देख उसे रंग-ए-बहार ओ सर्व ओ गुल और जूएबार

नज़ीर अकबराबादी

देख ले इस चमन-ए-दहर को दिल भर के 'नज़ीर'

नज़ीर अकबराबादी

चमक है दर्द है कौंदन पड़ी है हूक उठती है

नज़ीर अकबराबादी

चलते चलते न ख़लिश कर फ़लक-ए-दूँ से 'नज़ीर'

नज़ीर अकबराबादी

भुला दीं हम ने किताबें कि उस परी-रू के

नज़ीर अकबराबादी

बे-ज़री फ़ाक़ा-कशी मुफ़्लिसी बे-सामानी

नज़ीर अकबराबादी

बंदे के क़लम हाथ में होता तो ग़ज़ब था

नज़ीर अकबराबादी

बाग़ में लगता नहीं सहरा में घबराता है दिल

नज़ीर अकबराबादी

बदन गुल चेहरा गुल रुख़्सार गुल लब गुल दहन है गुल

नज़ीर अकबराबादी

अश्कों के तसलसुल ने छुपाया तन-ए-उर्यां

नज़ीर अकबराबादी

अजब मुश्किल है क्या कहिए बग़ैर-अज़-जान देने के

नज़ीर अकबराबादी

ऐ चश्म जो ये अश्क तू भर लाई है कम-बख़्त

नज़ीर अकबराबादी

अभी कहें तो किसी को न ए'तिबार आवे

नज़ीर अकबराबादी

अबस मेहनत है कुछ हासिल नहीं पत्थर-तराशी से

नज़ीर अकबराबादी

अब तो ज़रा सा गाँव भी बेटी न दे उसे

नज़ीर अकबराबादी

आते ही जो तुम मेरे गले लग गए वल्लाह

नज़ीर अकबराबादी

आरज़ू ख़ूब है मौक़ा से अगर हो वर्ना

नज़ीर अकबराबादी

अब मैं हूँ मिरी जागती रातें हैं ख़ुदा है

नज़ीर अहमद नाजी

ज़िंदा रहने के तक़ाज़ों ने मुझे मार दिया

नज़र जावेद

ये तो ऐ 'जावेद' गुज़रे मौसमों की राख है

नज़र जावेद