Couplets Poetry (page 232)
ठहरना इश्क़ के आफ़ात के सदमों में 'नज़ीर'
नज़ीर अकबराबादी
था इरादा तिरी फ़रियाद करें हाकिम से
नज़ीर अकबराबादी
तेशे की क्या मजाल थी ये जो तराशे बे सुतूँ
नज़ीर अकबराबादी
तर रखियो सदा या-रब तू इस मिज़ा-ए-तर को
नज़ीर अकबराबादी
सुनो मैं ख़ूँ को अपने साथ ले आया हूँ और बाक़ी
नज़ीर अकबराबादी
शहर-ए-दिल आबाद था जब तक वो शहर-आरा रहा
नज़ीर अकबराबादी
शहर में लगता नहीं सहरा से घबराता है दिल
नज़ीर अकबराबादी
शब को आ कर वो फिर गया हैहात
नज़ीर अकबराबादी
सरसब्ज़ रखियो किश्त को ऐ चश्म तू मिरी
नज़ीर अकबराबादी
सर-चश्मा-ए-बक़ा से हरगिज़ न आब लाओ
नज़ीर अकबराबादी
सब किताबों के खुल गए मअ'नी
नज़ीर अकबराबादी
रंज-ए-दिल यूँ गया रुख़ उस का देख
नज़ीर अकबराबादी
क़िस्मत में गर हमारी ये मय है तो साक़िया
नज़ीर अकबराबादी
पुकारा क़ासिद-ए-अश्क आज फ़ौज-ए-ग़म के हाथों से
नज़ीर अकबराबादी
'नज़ीर' तेरी इशारतों से ये बातें ग़ैरों की सुन रहा है
नज़ीर अकबराबादी
'नज़ीर' अब इस नदामत से कहूँ क्या
नज़ीर अकबराबादी
न इतना ज़ुल्म कर ऐ चाँदनी बहर-ए-ख़ुदा छुप जा
नज़ीर अकबराबादी
न गुल अपना न ख़ार अपना न ज़ालिम बाग़बाँ अपना
नज़ीर अकबराबादी
मुंतज़िर उस के दिला ता-ब-कुजा बैठना
नज़ीर अकबराबादी
मुँह ज़र्द ओ आह-ए-सर्द ओ लब-ए-ख़ुश्क ओ चश्म-ए-तर
नज़ीर अकबराबादी
मिरी इस चश्म-ए-तर से अब्र-ए-बाराँ को है क्या निस्बत
नज़ीर अकबराबादी
मज़मून-ए-सर्द-मेहरी-ए-जानाँ रक़म करूँ
नज़ीर अकबराबादी
मरता है जो महबूब की ठोकर पे 'नज़ीर' आह
नज़ीर अकबराबादी
मैं हूँ पतंग-ए-काग़ज़ी डोर है उस के हाथ में
नज़ीर अकबराबादी
मैं हूँ पतंग-ए-काग़ज़ी डोर है उस के हाथ में
नज़ीर अकबराबादी
मैं दस्त-ओ-गरेबाँ हूँ दम-ए-बाज़-पुसीं से
नज़ीर अकबराबादी
मय पी के जो गिरता है तो लेते हैं उसे थाम
नज़ीर अकबराबादी
मय भी है मीना भी है साग़र भी है साक़ी नहीं
नज़ीर अकबराबादी
लिख लिख के 'नज़ीर' इस ग़ज़ल-ए-ताज़ा को ख़ूबाँ
नज़ीर अकबराबादी
क्यूँ नहीं लेता हमारी तू ख़बर ऐ बे-ख़बर
नज़ीर अकबराबादी