Couplets Poetry (page 231)
साथ चलना है तो फिर छोड़ दे सारी दुनिया
नज़ीर बाक़री
मैं ने दुनिया छोड़ दी लेकिन मिरा मुर्दा बदन
नज़ीर बाक़री
मैं एक ज़र्रा बुलंदी को छूने निकला था
नज़ीर बाक़री
किसी ने हाथ बढ़ाया है दोस्ती के लिए
नज़ीर बाक़री
ख़ूब गए परदेस कि अपने दीवार-ओ-दर भूल गए
नज़ीर बाक़री
खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए
नज़ीर बाक़री
इस लिए चल न सका कोई भी ख़ंजर मुझ पर
नज़ीर बाक़री
अपनी आँखों के समुंदर में उतर जाने दे
नज़ीर बाक़री
आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी
नज़ीर बाक़री
आ गया याद उन्हें अपने किसी ग़म का हिसाब
नज़ीर बाक़री
तुझ में गर बारिश समुंदर के बराबर है तो क्या
नज़ीर आज़ाद
तिरा ख़याल मिरे दिल में कैसे घर करता
नज़ीर आज़ाद
क्या मिला जुज़ सुकूत-ए-बे-पायाँ
नज़ीर आज़ाद
आँख भर इश्क़ और बदन भर चाह
नज़ीर आज़ाद
आबाद है इस दिल का जहाँ जिस के क़दम से
नज़ीर आज़ाद
ज़माने के हाथों से चारा नहीं है
नज़ीर अकबराबादी
यूँ तो हम थे यूँही कुछ मिस्ल-ए-अनार-ओ-महताब
नज़ीर अकबराबादी
यूँ तो हम कुछ न थे पर मिस्ल-ए-अनार-ओ-महताब
नज़ीर अकबराबादी
ये जवाहिर-ख़ाना-ए-दुनिया जो है बा-आब-ओ-ताब
नज़ीर अकबराबादी
यार के आगे पढ़ा ये रेख़्ता जा कर 'नज़ीर'
नज़ीर अकबराबादी
वो मय-कदे में हलावत है रिंद-ए-मय-कश को
नज़ीर अकबराबादी
वो आप से रूठा नहीं मनने का 'नज़ीर' आह
नज़ीर अकबराबादी
वामाँदगान-ए-राह तो मंज़िल पे जा पड़े
नज़ीर अकबराबादी
उस बेवफ़ा ने हम को अगर अपने इश्क़ में
नज़ीर अकबराबादी
तुम्हारे हिज्र में आँखें हमारी मुद्दत से
नज़ीर अकबराबादी
तूफ़ाँ उठा रहा है मिरे दिल में सैल-ए-अश्क
नज़ीर अकबराबादी
तू जो कल आने को कहता है 'नज़ीर'
नज़ीर अकबराबादी
तू है वो गुल ऐ जाँ कि तिरे बाग़ में है शौक़
नज़ीर अकबराबादी
तोड़े हैं बहुत शीशा-ए-दिल जिस ने 'नज़ीर' आह
नज़ीर अकबराबादी
थे हम तो ख़ुद-पसंद बहुत लेकिन इश्क़ में
नज़ीर अकबराबादी