Couplets Poetry (page 241)

वो यूँ मिला है कि जैसे कभी मिला ही न था

नासिर ज़ैदी

वो भी क्या दिन थे कि जब इश्क़ किया करते थे

नासिर ज़ैदी

मैं बे-हुनर था मगर सोहबत-ए-हुनर में रहा

नासिर ज़ैदी

कोई सन्नाटा सा सन्नाटा है

नासिर ज़ैदी

हाँ ये ख़ता हुई थी कि हम उठ के चल दिए

नासिर ज़ैदी

देखा उसे तो आँख से आँसू निकल पड़े

नासिर ज़ैदी

याद आए तू मुझ को बहुत जब शब कटे जब पौ फटे

नासिर शहज़ाद

उम्रों के बुझते मामूरे में

नासिर शहज़ाद

तुझ से मिली निगाह तो देखा कि दरमियाँ

नासिर शहज़ाद

तुझ से बिछड़े गाँव छूटा शहर में आ कर बसे

नासिर शहज़ाद

तुझे पछाड़ न दें रौशनी में तेरे रफ़ीक़

नासिर शहज़ाद

शाह-बलूत के ऊपर देख

नासिर शहज़ाद

साँस में साजना हवा की तरह

नासिर शहज़ाद

संगत दिलों की जीवनों मरणों का इर्तिबात

नासिर शहज़ाद

क़ाएम है आबरू तो ग़नीमत यही समझ

नासिर शहज़ाद

पुस्तकों में प्रानों में अर्ज़ों में आसमानों में

नासिर शहज़ाद

फिर यूँ हुआ कि मुझ से वो यूँही बिछड़ गया

नासिर शहज़ाद

फिर मुझे मिल नदी किनारे कहीं

नासिर शहज़ाद

पाटी हैं हम ने बिफरी चनाबें तिरे लिए

नासिर शहज़ाद

पाँव के नीचे सरकती हुई रीत

नासिर शहज़ाद

नैन नचंत हैं देख के तुझ को

नासिर शहज़ाद

मजमा' नहीं मुजल्ला है अशआ'र की जगह

नासिर शहज़ाद

कुछ गुरेज़ाँ भी रहे हम ख़ुद से

नासिर शहज़ाद

खिले धान खिलखिला कर पड़े नद्दियों में नाके

नासिर शहज़ाद

जब कि तुझ बिन नहीं मौजूद कोई

नासिर शहज़ाद

हम वो लोग हैं जो चाहत में

नासिर शहज़ाद

हिजरतों में हूजुरियों के जतन

नासिर शहज़ाद

इक ख़ित्ता-ए-ख़ूँ में कहीं दरिया के किनारे

नासिर शहज़ाद

एक काटा राम ने सीता के साथ

नासिर शहज़ाद

देना मिरा संदेश सखी फिर

नासिर शहज़ाद