Couplets Poetry (page 243)

शोर बरपा है ख़ाना-ए-दिल में

नासिर काज़मी

सारा दिन तपते सूरज की गर्मी में जलते रहे

नासिर काज़मी

रह-नवर्द-ए-बयाबान-ए-ग़म सब्र कर सब्र कर

नासिर काज़मी

रात कितनी गुज़र गई लेकिन

नासिर काज़मी

पहाड़ों से चली फिर कोई आँधी

नासिर काज़मी

ओ मेरे मसरूफ़ ख़ुदा

नासिर काज़मी

निय्यत-ए-शौक़ भर न जाए कहीं

नासिर काज़मी

नींद आती नहीं तो सुबह तलक

नासिर काज़मी

नई दुनिया के हंगामों में 'नासिर'

नासिर काज़मी

नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिए

नासिर काज़मी

न मिला कर उदास लोगों से

नासिर काज़मी

न अब वो यादों का चढ़ता दरिया न फ़ुर्सतों की उदास बरखा

नासिर काज़मी

मुझे ये डर है तिरी आरज़ू न मिट जाए

नासिर काज़मी

मुझे तो ख़ैर वतन छोड़ कर अमाँ न मिली

नासिर काज़मी

मुद्दत से कोई आया न गया सुनसान पड़ी है घर की फ़ज़ा

नासिर काज़मी

मैं तो बीते दिनों की खोज में हूँ

नासिर काज़मी

मैं सोते सोते कई बार चौंक चौंक पड़ा

नासिर काज़मी

मैं इस जानिब तू उस जानिब

नासिर काज़मी

मैं हूँ रात का एक बजा है

नासिर काज़मी

कुछ यादगार-ए-शहर-ए-सितमगर ही ले चलें

नासिर काज़मी

कौन अच्छा है इस ज़माने में

नासिर काज़मी

कल जो था वो आज नहीं जो आज है कल मिट जाएगा

नासिर काज़मी

कहते हैं ग़ज़ल क़ाफ़िया-पैमाई है 'नासिर'

नासिर काज़मी

कभी ज़ुल्फ़ों की घटा ने घेरा

नासिर काज़मी

जुर्म-ए-उम्मीद की सज़ा ही दे

नासिर काज़मी

जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिए

नासिर काज़मी

जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिए

नासिर काज़मी

जिन्हें हम देख कर जीते थे 'नासिर'

नासिर काज़मी

इस शहर-ए-बे-चराग़ में जाएगी तू कहाँ

नासिर काज़मी

इस क़दर रोया हूँ तेरी याद में

नासिर काज़मी