Couplets Poetry (page 242)

देखा क़द-ए-गुनाह पे जब इस को मुल्तफ़ित

नासिर शहज़ाद

दरिया पे टीकरी से परे ख़ानक़ाह थी

नासिर शहज़ाद

चौखटा दिल का यहाँ है हू-ब-हू तुझ सा कोई

नासिर शहज़ाद

अख़रोट खाएँ तापें अँगेठी पे आग आ

नासिर शहज़ाद

ज़िंदगी जिन के तसव्वुर से जिला पाती थी

नासिर काज़मी

ज़रा सी बात सही तेरा याद आ जाना

नासिर काज़मी

यूँ तो हर शख़्स अकेला है भरी दुनिया में

नासिर काज़मी

यूँ किस तरह कटेगा कड़ी धूप का सफ़र

नासिर काज़मी

ये सुब्ह की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ

नासिर काज़मी

ये हक़ीक़त है कि अहबाब को हम

नासिर काज़मी

ये आप हम तो बोझ हैं ज़मीन का

नासिर काज़मी

याद है अब तक तुझ से बिछड़ने की वो अँधेरी शाम मुझे

नासिर काज़मी

याद आई वो पहली बारिश

नासिर काज़मी

वो शहर में था तो उस के लिए औरों से भी मिलना पड़ता था

नासिर काज़मी

वो रात का बे-नवा मुसाफ़िर वो तेरा शाइर वो तेरा 'नासिर'

नासिर काज़मी

वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का

नासिर काज़मी

वो दिल-नवाज़ है लेकिन नज़र-शनास नहीं

नासिर काज़मी

वक़्त अच्छा भी आएगा 'नासिर'

नासिर काज़मी

उस ने मंज़िल पे ला के छोड़ दिया

नासिर काज़मी

उन्हें सदियों न भूलेगा ज़माना

नासिर काज़मी

उम्र भर की नवा-गरी का सिला

नासिर काज़मी

तुझ बिन सारी उम्र गुज़ारी

नासिर काज़मी

तू ने तारों से शब की माँग भरी

नासिर काज़मी

तेरी मजबूरियाँ दुरुस्त मगर

नासिर काज़मी

तिरे फ़िराक़ की रातें कभी न भूलेंगी

नासिर काज़मी

तिरे आने का धोका सा रहा है

नासिर काज़मी

तन्हाइयाँ तुम्हारा पता पूछती रहीं

नासिर काज़मी

तनाब-ए-ख़ेमा-ए-गुल थाम 'नासिर'

नासिर काज़मी

सूरज सर पे आ पहुँचा

नासिर काज़मी

सो गए लोग उस हवेली के

नासिर काज़मी