Couplets Poetry (page 439)
बे-तलब जो मिला मिला मुझ को
दाग़ देहलवी
बने हैं जब से वो लैला नई महमिल में रहते हैं
दाग़ देहलवी
बहुत रोया हूँ मैं जब से ये मैं ने ख़्वाब देखा है
दाग़ देहलवी
बड़ा मज़ा हो जो महशर में हम करें शिकवा
दाग़ देहलवी
बात तक करनी न आती थी तुम्हें
दाग़ देहलवी
बात का ज़ख़्म है तलवार के ज़ख़्मों से सिवा
दाग़ देहलवी
ब'अद मुद्दत के ये ऐ 'दाग़' समझ में आया
दाग़ देहलवी
अयादत को मिरी आ कर वो ये ताकीद करते हैं
दाग़ देहलवी
अयादत को मिरी आ कर वो ये ताकीद करते हैं
दाग़ देहलवी
और होंगे तिरी महफ़िल से उभरने वाले
दाग़ देहलवी
अर्ज़-ए-अहवाल को गिला समझे
दाग़ देहलवी
ऐ दाग़ अपनी वज़्अ' हमेशा यही रही
दाग़ देहलवी
अभी आई भी नहीं कूचा-ए-दिलबर से सदा
दाग़ देहलवी
अब तो बीमार-ए-मोहब्बत तेरे
दाग़ देहलवी
आती है बात बात मुझे बार बार याद
दाग़ देहलवी
आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद
दाग़ देहलवी
आप पछताएँ नहीं जौर से तौबा न करें
दाग़ देहलवी
आप का ए'तिबार कौन करे
दाग़ देहलवी
आओ मिल जाओ कि ये वक़्त न पाओगे कभी
दाग़ देहलवी
गुफ़्तुगू में वो हलावत वो अमल में इख़्लास
दाएम ग़व्वासी
दिन तो शिकम की आग बुझाने में जाए है
दाएम ग़व्वासी
नोट दिखला कर उसे हम खेंच लाए अपने हाँ
चूँचाल सियालकोटी
या-रब ग़म-ए-हिज्राँ में इतना तो किया होता
चराग़ हसन हसरत
उम्मीद तो बंध जाती तस्कीन तो हो जाती
चराग़ हसन हसरत
उमीद-ए-वस्ल ने धोके दिए हैं इस क़दर 'हसरत'
चराग़ हसन हसरत
रात की बात का मज़कूर ही क्या
चराग़ हसन हसरत
क़ुबूल इस बारगह में इल्तिजा कोई नहीं होती
चराग़ हसन हसरत
इस तरह कर गया दिल को मिरे वीराँ कोई
चराग़ हसन हसरत
ग़ैरों से कहा तुम ने ग़ैरों से सुना तुम ने
चराग़ हसन हसरत
इक इश्क़ का ग़म आफ़त और उस पे ये दिल आफ़त
चराग़ हसन हसरत