Couplets Poetry (page 441)

इक अज़िय्यत है तो लज़्ज़त भी तिरे दर्द में है

बुशरा फर्रुख

शब भी है वही हम भी वही तुम भी वही हो

बुशरा एजाज़

मिरी अपनी और उस की आरज़ू में फ़र्क़ ये था

बुशरा एजाज़

मिरे नुक्ता-दाँ तिरा फ़हम अपनी मिसाल है

बुशरा एजाज़

जब राख से उट्ठेगा कभी इश्क़ का शोला

बुशरा एजाज़

अपने सारे रास्ते अंदर की जानिब मोड़ कर

बुशरा एजाज़

नफ़रत से बचा कर तू उल्फ़त को सजा दिल में

बबल्स होरा सबा

ज़माना-साज़ियों से मैं हमेशा दूर रहता हैं

बिस्मिल सईदी

तुम जब आते हो तो जाने के लिए आते हो

बिस्मिल सईदी

ठोकर किसी पत्थर से अगर खाई है मैं ने

बिस्मिल सईदी

सुकूँ नसीब हुआ हो कभी जो तेरे बग़ैर

बिस्मिल सईदी

सर जिस पे न झुक जाए उसे दर नहीं कहते

बिस्मिल सईदी

रो रहा हूँ आज मैं सारे जहाँ के सामने

बिस्मिल सईदी

ना-उम्मीदी है बुरी चीज़ मगर

बिस्मिल सईदी

ना-उमीदी है बुरी चीज़ मगर

बिस्मिल सईदी

मोहब्बत में ख़ुदा जाने हुईं रुस्वाइयाँ किस से

बिस्मिल सईदी

मेरे दिल को भी पड़ा रहने दो

बिस्मिल सईदी

किया तबाह तो दिल्ली ने भी बहुत 'बिस्मिल'

बिस्मिल सईदी

किसी के सितम इस क़दर याद आए

बिस्मिल सईदी

ख़ुश्बू को फैलने का बहुत शौक़ है मगर

बिस्मिल सईदी

काबे में मुसलमान को कह देते हैं काफ़िर

बिस्मिल सईदी

इश्क़ भी है किस क़दर बर-ख़ुद-ग़लत

बिस्मिल सईदी

हुस्न भी कम्बख़्त कब ख़ाली है सोज़-ए-इश्क़ से

बिस्मिल सईदी

दोहराई जा सकेगी न अब दास्तान-ए-इश्क़

बिस्मिल सईदी

दो दिन में हो गया है ये आलम कि जिस तरह

बिस्मिल सईदी

वो अक्स बन के मिरी चश्म-ए-तर में रहता है

बिस्मिल साबरी

निकल के आ तो गया गहरे पानियों से मगर

बिस्मिल साबरी

जब आया ईद का दिन घर में बेबसी की तरह

बिस्मिल साबरी

अब वादा-ए-फ़र्दा में कशिश कुछ नहीं बाक़ी

बिस्मिल साबरी

ये ज़िंदगी भी कोई ज़िंदगी हुई 'बिस्मिल'

बिस्मिल अज़ीमाबादी