Couplets Poetry (page 443)
देखने निकला हूँ दुनिया को मगर क्या देखूँ
बिमल कृष्ण अश्क
दायरा खींच के बैठा हूँ बड़ी मुद्दत से
बिमल कृष्ण अश्क
बदन के लोच तक आज़ाद है वो
बिमल कृष्ण अश्क
बदन ढाँपे हुए फिरता हूँ यानी
बिमल कृष्ण अश्क
ऐसा हुआ कि घर से न निकला तमाम दिन
बिमल कृष्ण अश्क
अब यही दुख है हमीं में थी कमी उस में न थी
बिमल कृष्ण अश्क
अब के बसंत आई तो आँखें उजड़ गईं
बिमल कृष्ण अश्क
ज़रा सी देर भी रुकता तो कुछ पता चलता
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
यूँ चुप रहा करे से तो हो जाए है जुनूँ
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
उठ कर चले गए तो कभी फिर न आएँगे
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
तेरी तो 'बिल्क़ीस' निराली ही बातें हैं
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
तमाम लाला ओ गुल के चराग़ रौशन हैं
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
नहीं है ख़्वाब दीवाने का हस्ती
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
मेरी तरह टूटे आईने में उस ने भी
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
कितने सादा हैं हम कि बैठे हैं
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
ख़ुद पे ये ज़ुल्म गवारा नहीं होगा हम से
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
ख़ुद अपनी फ़िक्र उगाती है वहम के काँटे
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
जिन में खो कर हम ख़ुद को भी भूल गए हैं
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
जाने क्या कुछ है आज होने को
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
हम तो बेगाने से ख़ुद को भी मिले हैं 'बिल्क़ीस'
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
हर-दिल-अज़ीज़ वो भी है हम भी हैं ख़ुश-मिज़ाज
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
है यूँ कि कुछ तो बग़ावत-सिरिश्त हम भी हैं
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
दर बदर की ख़ाक थी तक़दीर में
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
दहशत-ज़दा ज़मीं पर वहशत भरे मकाँ ये
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
बस एक जान बची थी छिड़क दी राहों पर
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
अपनी तो कोई बात बनाए नहीं बनी
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
अनहोनी कुछ ज़रूर हुई दिल के साथ आज
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
उलझ रहा था अभी ख़्वाब की फ़सील से मैं
बिलाल अहमद
सुना है मैं ने अज़िय्यत मज़ा भी देती है
बिलाल अहमद
रिस रहा है मुद्दत से कोई पहला ग़म मुझ में
बिलाल अहमद