Couplets Poetry (page 444)
हमारी ख़ाक तबर्रुक समझ के ले जाओ
बिलाल अहमद
एक काँटे की खटक से दिल मिरा आबाद था
बिलाल अहमद
एक हालत थी मिरी और एक हालत दिल की थी
बिलाल अहमद
अजीब क़ैद थी जिस में बहुत ख़ुशी थी मुझे
बिलाल अहमद
अजीब ढंग से तक़सीम-ए-कार की उस ने
बिलाल अहमद
ये कह दो बस मौत से हो रुख़्सत क्यूँ नाहक़ आई है उस की शामत
भारतेंदु हरिश्चंद्र
ये चार दिन के तमाशे हैं आह दुनिया के
भारतेंदु हरिश्चंद्र
रुख़-ए-रौशन पे उस की गेसू-ए-शब-गूँ लटकते हैं
भारतेंदु हरिश्चंद्र
क़ब्र में राहत से सोए थे न था महशर का ख़ौफ़
भारतेंदु हरिश्चंद्र
न बोसा लेने देते हैं न लगते हैं गले मेरे
भारतेंदु हरिश्चंद्र
मसल सच है बशर की क़दर नेमत ब'अद होती है
भारतेंदु हरिश्चंद्र
मर गए हम पर न आए तुम ख़बर को ऐ सनम
भारतेंदु हरिश्चंद्र
किसी पहलू नहीं चैन आता है उश्शाक़ को तेरे
भारतेंदु हरिश्चंद्र
किसी पहलू नहीं आराम आता तेरे आशिक़ को
भारतेंदु हरिश्चंद्र
किस गुल के तसव्वुर में है ऐ लाला जिगर-ख़ूँ
भारतेंदु हरिश्चंद्र
जहाँ देखो वहाँ मौजूद मेरा कृष्ण प्यारा है
भारतेंदु हरिश्चंद्र
हो गया लाग़र जो उस लैला-अदा के इश्क़ में
भारतेंदु हरिश्चंद्र
गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझ को भी जमाने दो
भारतेंदु हरिश्चंद्र
ग़ाफ़िल इतना हुस्न पे ग़र्रा ध्यान किधर है तौबा कर
भारतेंदु हरिश्चंद्र
छानी कहाँ न ख़ाक न पाया कहीं तुम्हें
भारतेंदु हरिश्चंद्र
बुत-ए-काफ़िर जो तू मुझ से ख़फ़ा हो
भारतेंदु हरिश्चंद्र
बात करने में जो लब उस के हुए ज़ेर-ओ-ज़बर
भारतेंदु हरिश्चंद्र
ऐ 'रसा' जैसा है बरगश्ता ज़माना हम से
भारतेंदु हरिश्चंद्र
अभी तो आए हो जल्दी कहाँ है जाने की
भारतेंदु हरिश्चंद्र
आ जाए न दिल आप का भी और किसी पर
भारतेंदु हरिश्चंद्र
ये सूरज कब निकलता है उन्हीं से पूछना होगा
भारत भूषण पन्त
ये सब तो दुनिया में होता रहता है
भारत भूषण पन्त
ये क्या कि रोज़ उभरते हो रोज़ डूबते हो
भारत भूषण पन्त
ये क्या कि रोज़ पहुँच जाता हूँ मैं घर अपने
भारत भूषण पन्त
याद भी आता नहीं कुछ भूलता भी कुछ नहीं
भारत भूषण पन्त