Couplets Poetry (page 445)

वर्ना तो हम मंज़र और पस-मंज़र में उलझे रहते

भारत भूषण पन्त

उसे इक बुत के आगे सर झुकाते सब ने देखा है

भारत भूषण पन्त

उम्मीदों से पर्दा रक्खा ख़ुशियों से महरूम रहीं

भारत भूषण पन्त

तू हमेशा माँगता रहता है क्यूँ ग़म से नजात

भारत भूषण पन्त

सूरज से उस का नाम-ओ-नसब पूछता था मैं

भारत भूषण पन्त

शायद बता दिया था किसी ने मिरा पता

भारत भूषण पन्त

सबब ख़ामोशियों का मैं नहीं था

भारत भूषण पन्त

मैं ने माना एक गुहर हूँ फिर भी सदफ़ में हूँ

भारत भूषण पन्त

मैं थोड़ी देर भी आँखों को अपनी बंद कर लूँ तो

भारत भूषण पन्त

मैं अपने लफ़्ज़ यूँ बातों में ज़ाए कर नहीं सकता

भारत भूषण पन्त

मैं अब जो हर किसी से अजनबी सा पेश आता हूँ

भारत भूषण पन्त

कितना आसान था बचपन में सुलाना हम को

भारत भूषण पन्त

ख़ामोशी में चाहे जितना बेगाना-पन हो

भारत भूषण पन्त

कहीं जैसे मैं कोई चीज़ रख कर भूल जाता हूँ

भारत भूषण पन्त

जाने कितने लोग शामिल थे मिरी तख़्लीक़ में

भारत भूषण पन्त

इतनी सी बात रात पता भी नहीं लगी

भारत भूषण पन्त

इतना तो समझते थे हम भी उस की मजबूरी

भारत भूषण पन्त

इस तरह तो और भी दीवानगी बढ़ जाएगी

भारत भूषण पन्त

हम वो सहरा के मुसाफ़िर हैं अभी तक जिन की

भारत भूषण पन्त

हम सराबों में हुए दाख़िल तो ये हम पर खुला

भारत भूषण पन्त

हम काफ़िरों ने शौक़ में रोज़ा तो रख लिया

भारत भूषण पन्त

हर घड़ी तेरा तसव्वुर हर नफ़स तेरा ख़याल

भारत भूषण पन्त

हमारी बात किसी की समझ में क्यूँ आती

भारत भूषण पन्त

हमारे हाल पे अब छोड़ दे हमें दुनिया

भारत भूषण पन्त

घर से निकल कर जाता हूँ मैं रोज़ कहाँ

भारत भूषण पन्त

एक जैसे लग रहे हैं अब सभी चेहरे मुझे

भारत भूषण पन्त

दामन के चाक सीने को बैठे हैं जब भी हम

भारत भूषण पन्त

बस ज़रा इक आइने के टूटने की देर थी

भारत भूषण पन्त

अब तो इतनी बार हम रस्ते में ठोकर खा चुके

भारत भूषण पन्त

आँखों में एक बार उभरने की देर थी

भारत भूषण पन्त