Couplets Poetry (page 446)
आज खेलेंगे मिरे ख़ून से होली सब लोग
बेताब सूरी
तड़प के रह गई बुलबुल क़फ़स में ऐ सय्याद
बेताब अज़ीमाबादी
लड़ गई उन से नज़र खिंच गए अबरू उन के
बेताब अज़ीमाबादी
कितने इल्ज़ाम आख़िर अपने सर
बेताब अज़ीमाबादी
असर न पूछिए साक़ी की मस्त आँखों का
बेताब अज़ीमाबादी
ज़माना हम ने ज़ालिम छान मारा
बेख़ुद देहलवी
ज़ाहिदों से न बनी हश्र के दिन भी या-रब
बेख़ुद देहलवी
ये कह के मेरे सामने टाला रक़ीब को
बेख़ुद देहलवी
वो कुछ मुस्कुराना वो कुछ झेंप जाना
बेख़ुद देहलवी
वफ़ा का नाम तो पीछे लिया है
बेख़ुद देहलवी
उन्हें तो सितम का मज़ा पड़ गया है
बेख़ुद देहलवी
उन के आते ही हुआ हसरत-ओ-अरमाँ का हुजूम
बेख़ुद देहलवी
तुम्हारी याद मेरा दिल ये दिनों चलते पुर्ज़े हैं
बेख़ुद देहलवी
तुम्हारे हाथ ख़ाली जेब ख़ाली ज़ुल्फ़ ख़ाली थी
बेख़ुद देहलवी
तीर-ए-क़ातिल को कलेजे से लगा रक्खा है
बेख़ुद देहलवी
तिरी तेग़ का लाल कर दूँगा मुँह
बेख़ुद देहलवी
तकिया हटता नहीं पहलू से ये क्या है 'बेख़ुद'
बेख़ुद देहलवी
सुन के सारी दास्तान-ए-रंज-ओ-ग़म
बेख़ुद देहलवी
सवाल-ए-वस्ल पर कुछ सोच कर उस ने कहा मुझ से
बेख़ुद देहलवी
सौदा-ए-इश्क़ और है वहशत कुछ और शय
बेख़ुद देहलवी
सख़्त-जाँ हूँ मुझे इक वार से क्या होता है
बेख़ुद देहलवी
रिंद-मशरब कोई 'बेख़ुद' सा न होगा वल्लाह
बेख़ुद देहलवी
रक़ीबों के लिए अच्छा ठिकाना हो गया पैदा
बेख़ुद देहलवी
राह में बैठा हूँ मैं तुम संग-ए-रह समझो मुझे
बेख़ुद देहलवी
क़यामत है तिरी उठती जवानी
बेख़ुद देहलवी
पढ़े जाओ 'बेख़ुद' ग़ज़ल पर ग़ज़ल
बेख़ुद देहलवी
नज़र कहीं है मुख़ातब किसी से हैं दिल में
बेख़ुद देहलवी
नौ-गिरफ़्तार-ए-मोहब्बत हूँ वफ़ा मुझ में कहाँ
बेख़ुद देहलवी
नमक भर कर मिरे ज़ख़्मों में तुम क्या मुस्कुराते हो
बेख़ुद देहलवी
नामा-बर ये तो कही बात पते की तू ने
बेख़ुद देहलवी