Couplets Poetry (page 442)
ये कह के देती जाती है तस्कीं शब-ए-फ़िराक़
बिस्मिल अज़ीमाबादी
वक़्त आने दे दिखा देंगे तुझे ऐ आसमाँ
बिस्मिल अज़ीमाबादी
उगल न संग-ए-मलामत ख़ुदा से डर नासेह
बिस्मिल अज़ीमाबादी
तुम सुन के क्या करोगे कहानी ग़रीब की
बिस्मिल अज़ीमाबादी
सौदा वो क्या करेगा ख़रीदार देख कर
बिस्मिल अज़ीमाबादी
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
रहरव-ए-राह-ए-मोहब्बत रह न जाना राह में
बिस्मिल अज़ीमाबादी
न अपने ज़ब्त को रुस्वा करो सता के मुझे
बिस्मिल अज़ीमाबादी
मजबूरियों को अपनी कहें क्या किसी से हम
बिस्मिल अज़ीमाबादी
क्या करें जाम-ओ-सुबू हाथ पकड़ लेते हैं
बिस्मिल अज़ीमाबादी
ख़िज़ाँ जब तक चली जाती नहीं है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
जुरअत-ए-शौक़ तो क्या कुछ नहीं कहती लेकिन
बिस्मिल अज़ीमाबादी
हो न मायूस ख़ुदा से 'बिस्मिल'
बिस्मिल अज़ीमाबादी
हँसी 'बिस्मिल' की हालत पर किसी को
बिस्मिल अज़ीमाबादी
ग़ैरों ने ग़ैर जान के हम को उठा दिया
बिस्मिल अज़ीमाबादी
इक ग़लत सज्दे से क्या होता है वाइज़ कुछ न पूछ
बिस्मिल अज़ीमाबादी
एक दिन वो दिन थे रोने पे हँसा करते थे हम
बिस्मिल अज़ीमाबादी
देखा न तुम ने आँख उठा कर भी एक बार
बिस्मिल अज़ीमाबादी
दास्ताँ पूरी न होने पाई
बिस्मिल अज़ीमाबादी
'बिस्मिल' बुतों का इश्क़ मुबारक तुम्हें मगर
बिस्मिल अज़ीमाबादी
अल्लाह तेरे हाथ है अब आबरू-ए-शौक़
बिस्मिल अज़ीमाबादी
सिमटा तिरा ख़याल तो दिल में समा गया
बिस्मिल आग़ाई
हर सम्त है वीरानी सी वीरानी का आलम
बिस्मिल आग़ाई
उसे छत पर खड़े देखा था मैं ने
बिमल कृष्ण अश्क
तुम तो कुछ ऐसे भूल गए हो जैसे कभी वाक़िफ़ ही नहीं थे
बिमल कृष्ण अश्क
सभी इंसाँ फ़रिश्ते हो गए हैं
बिमल कृष्ण अश्क
पड़ने लगे जो ज़ोर हवस का तो क्या निगाह
बिमल कृष्ण अश्क
मैं बंद कमरे की मजबूरियों में लेटा रहा
बिमल कृष्ण अश्क
जिस्म में ख़्वाहिश न थी एहसास में काँटा न था
बिमल कृष्ण अश्क
एक दुनिया ने तुझे देखा है लेकिन मैं ने
बिमल कृष्ण अश्क