Couplets Poetry (page 440)
आओ हुस्न-ए-यार की बातें करें
चराग़ हसन हसरत
हाए कितना लतीफ़ है वो ग़म
चंद्र प्रकाश जौहर बिजनौरी
मौत आएगी उस से मिल लेंगे
चमन लाल चमन
महँगाई में हर इक शय के दाम हुए हैं दूने
चमन लाल चमन
जिन का मक़्सद फ़रेब होता है
चमन लाल चमन
ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब
चकबस्त ब्रिज नारायण
ज़बान-ए-हाल से ये लखनऊ की ख़ाक कहती है
चकबस्त ब्रिज नारायण
ये कैसी बज़्म है और कैसे उस के साक़ी हैं
चकबस्त ब्रिज नारायण
वतन की ख़ाक से मर कर भी हम को उन्स बाक़ी है
चकबस्त ब्रिज नारायण
नया बिस्मिल हूँ मैं वाक़िफ़ नहीं रस्म-ए-शहादत से
चकबस्त ब्रिज नारायण
मज़ा है अहद-ए-जवानी में सर पटकने का
चकबस्त ब्रिज नारायण
मंज़िल-ए-इबरत है दुनिया अहल-ए-दुनिया शाद हैं
चकबस्त ब्रिज नारायण
लखनऊ में फिर हुई आरास्ता बज़्म-ए-सुख़न
चकबस्त ब्रिज नारायण
किया है फ़ाश पर्दा कुफ़्र-ओ-दीं का इस क़दर मैं ने
चकबस्त ब्रिज नारायण
ख़ुदा ने इल्म बख़्शा है अदब अहबाब करते हैं
चकबस्त ब्रिज नारायण
जो तू कहे तो शिकायत का ज़िक्र कम कर दें
चकबस्त ब्रिज नारायण
इस को ना-क़दरी-ए-आलम का सिला कहते हैं
चकबस्त ब्रिज नारायण
है मिरा ज़ब्त-ए-जुनूँ जोश-ए-जुनूँ से बढ़ कर
चकबस्त ब्रिज नारायण
गुनह-गारों में शामिल हैं गुनाहों से नहीं वाक़िफ़
चकबस्त ब्रिज नारायण
इक सिलसिला हवस का है इंसाँ की ज़िंदगी
चकबस्त ब्रिज नारायण
एक साग़र भी इनायत न हुआ याद रहे
चकबस्त ब्रिज नारायण
चराग़ क़ौम का रौशन है अर्श पर दिल के
चकबस्त ब्रिज नारायण
अज़ीज़ान-ए-वतन को ग़ुंचा ओ बर्ग ओ समर जाना
चकबस्त ब्रिज नारायण
अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता
चकबस्त ब्रिज नारायण
अदब ता'लीम का जौहर है ज़ेवर है जवानी का
चकबस्त ब्रिज नारायण
वही लफ़्ज़ हैं दुर्र-ए-बे-बहा मिरे वास्ते
बुशरा हाश्मी
सरमाया-ए-हयात हुआ चाहता है ख़त्म
बुशरा हाश्मी
जो न कट सका वो निशान था किसी ज़ख़्म का
बुशरा हाश्मी
दिल के ज़ख़्मों की चुभन दीदा-ए-तर से पूछो
बुशरा हाश्मी
अर्सा हुआ किसी ने पुकारा नहीं मुझे
बुशरा हाश्मी