Couplets Poetry (page 438)
हसरतें ले गए इस बज़्म से चलने वाले
दाग़ देहलवी
हमें है शौक़ कि बे-पर्दा तुम को देखेंगे
दाग़ देहलवी
हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं
दाग़ देहलवी
ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया
दाग़ देहलवी
ग़श खा के 'दाग़' यार के क़दमों पे गिर पड़ा
दाग़ देहलवी
ग़म्ज़ा भी हो सफ़्फ़ाक निगाहें भी हों ख़ूँ-रेज़
दाग़ देहलवी
फ़सुर्दा-दिल कभी ख़ल्वत न अंजुमन में रहे
दाग़ देहलवी
फ़लक देता है जिन को ऐश उन को ग़म भी होते हैं
दाग़ देहलवी
इक अदा मस्ताना सर से पाँव तक छाई हुई
दाग़ देहलवी
दुनिया में जानता हूँ कि जन्नत मुझे मिली
दाग़ देहलवी
दिल में समा गई हैं क़यामत की शोख़ियाँ
दाग़ देहलवी
दिल ले के उन की बज़्म में जाया न जाएगा
दाग़ देहलवी
दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं
दाग़ देहलवी
दिल क्या मिलाओगे कि हमें हो गया यक़ीं
दाग़ देहलवी
दिल का क्या हाल कहूँ सुब्ह को जब उस बुत ने
दाग़ देहलवी
दिल ही तो है न आए क्यूँ दम ही तो है न जाए क्यूँ
दाग़ देहलवी
दिल दे तो इस मिज़ाज का परवरदिगार दे
दाग़ देहलवी
दी शब-ए-वस्ल मोअज़्ज़िन ने अज़ाँ पिछली रात
दाग़ देहलवी
देखना हश्र में जब तुम पे मचल जाऊँगा
दाग़ देहलवी
देखना अच्छा नहीं ज़ानू पे रख कर आइना
दाग़ देहलवी
डरता हूँ देख कर दिल-ए-बे-आरज़ू को मैं
दाग़ देहलवी
'दाग़' को कौन देने वाला था
दाग़ देहलवी
दफ़अ'तन तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ में भी रुस्वाई है
दाग़ देहलवी
चुप-चाप सुनती रहती है पहरों शब-ए-फ़िराक़
दाग़ देहलवी
छेड़ माशूक़ से कीजे तो ज़रा थम थम कर
दाग़ देहलवी
चाह की चितवन में आँख उस की शरमाई हुई
दाग़ देहलवी
चाक हो पर्दा-ए-वहशत मुझे मंज़ूर नहीं
दाग़ देहलवी
भवें तनती हैं ख़ंजर हाथ में है तन के बैठे हैं
दाग़ देहलवी
भरे हैं तुझ में वो लाखों हुनर ऐ मजमअ-ए-ख़ूबी
दाग़ देहलवी
बे-ज़बानी ज़बाँ न हो जाए
दाग़ देहलवी