Couplets Poetry (page 437)
ख़ार-ए-हसरत बयान से निकला
दाग़ देहलवी
कल तक तो आश्ना थे मगर आज ग़ैर हो
दाग़ देहलवी
कहने देती नहीं कुछ मुँह से मोहब्बत मेरी
दाग़ देहलवी
कहीं है ईद की शादी कहीं मातम है मक़्तल में
दाग़ देहलवी
जोश-ए-रहमत के वास्ते ज़ाहिद
दाग़ देहलवी
जो तुम्हारी तरह तुम से कोई झूटे वादे करता
दाग़ देहलवी
जो गुज़रते हैं 'दाग़' पर सदमे
दाग़ देहलवी
जिस में लाखों बरस की हूरें हों
दाग़ देहलवी
जिस ख़त पे ये लगाई उसी का मिला जवाब
दाग़ देहलवी
जिस जगह बैठे मिरा चर्चा किया
दाग़ देहलवी
जिन को अपनी ख़बर नहीं अब तक
दाग़ देहलवी
जाओ भी क्या करोगे मेहर-ओ-वफ़ा
दाग़ देहलवी
जल्वे मिरी निगाह में कौन-ओ-मकाँ के हैं
दाग़ देहलवी
जली हैं धूप में शक्लें जो माहताब की थीं
दाग़ देहलवी
इस वहम में वो 'दाग़' को मरने नहीं देते
दाग़ देहलवी
इस नहीं का कोई इलाज नहीं
दाग़ देहलवी
इस लिए वस्ल से इंकार है हम जान गए
दाग़ देहलवी
इलाही क्यूँ नहीं उठती क़यामत माजरा क्या है
दाग़ देहलवी
इफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो ज़िल्लतें हुईं
दाग़ देहलवी
ईद है क़त्ल मिरा अहल-ए-तमाशा के लिए
दाग़ देहलवी
हम भी क्या ज़िंदगी गुज़ार गए
दाग़ देहलवी
हुआ है चार सज्दों पर ये दावा ज़ाहिदो तुम को
दाग़ देहलवी
होश ओ हवास ओ ताब ओ तवाँ 'दाग़' जा चुके
दाग़ देहलवी
हो सके क्या अपनी वहशत का इलाज
दाग़ देहलवी
हो चुका ऐश का जल्सा तू मुझे ख़त भेजा
दाग़ देहलवी
हज़रत-ए-दिल आप हैं किस ध्यान में
दाग़ देहलवी
हज़रत-ए-दाग़ जहाँ बैठ गए बैठ गए
दाग़ देहलवी
हज़रत-ए-'दाग़' है ये कूचा-ए-क़ातिल उठिए
दाग़ देहलवी
हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के 'दाग़'
दाग़ देहलवी
हज़ार बार जो माँगा करो तो क्या हासिल
दाग़ देहलवी