Couplets Poetry (page 435)
सुनाई जाती हैं दर-पर्दा गालियाँ मुझ को
दाग़ देहलवी
सुन के मिरा फ़साना उन्हें लुत्फ़ आ गया
दाग़ देहलवी
सितम ही करना जफ़ा ही करना निगाह-ए-उल्फ़त कभी न करना
दाग़ देहलवी
शोख़ी से ठहरती नहीं क़ातिल की नज़र आज
दाग़ देहलवी
शिरकत-ए-ग़म भी नहीं चाहती ग़ैरत मेरी
दाग़ देहलवी
शब-ए-वस्ल ज़िद में बसर हो गई
दाग़ देहलवी
शब-ए-वस्ल की क्या कहूँ दास्ताँ
दाग़ देहलवी
शब-ए-विसाल है गुल कर दो इन चराग़ों को
दाग़ देहलवी
साज़ ये कीना-साज़ क्या जानें
दाग़ देहलवी
साथ शोख़ी के कुछ हिजाब भी है
दाग़ देहलवी
सर मेरा काट के पछ्ताइएगा
दाग़ देहलवी
साक़िया तिश्नगी की ताब नहीं
दाग़ देहलवी
समझो पत्थर की तुम लकीर उसे
दाग़ देहलवी
सबक़ ऐसा पढ़ा दिया तू ने
दाग़ देहलवी
सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
दाग़ देहलवी
रुख़-ए-रौशन के आगे शम्अ रख कर वो ये कहते हैं
दाग़ देहलवी
रूह किस मस्त की प्यासी गई मय-ख़ाने से
दाग़ देहलवी
रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
दाग़ देहलवी
रह गए लाखों कलेजा थाम कर
दाग़ देहलवी
क़त्ल की सुन के ख़बर ईद मनाई मैं ने
दाग़ देहलवी
पूछिए मय-कशों से लुत्फ़-ए-शराब
दाग़ देहलवी
फिरता है मेरे दिल में कोई हर्फ़-ए-मुद्दआ
दाग़ देहलवी
फिरे राह से वो यहाँ आते आते
दाग़ देहलवी
फिर गया जब से कोई आ के हमारे दर तक
दाग़ देहलवी
निगह निकली न दिल की चोर ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं निकली
दाग़ देहलवी
ना-उमीदी बढ़ गई है इस क़दर
दाग़ देहलवी
नासेह ने मेरा हाल जो मुझ से बयाँ किया
दाग़ देहलवी
नहीं खेल ऐ 'दाग़' यारों से कह दो
दाग़ देहलवी
न समझा उम्र गुज़री उस बुत-ए-काफ़र को समझाते
दाग़ देहलवी
न रोना है तरीक़े का न हँसना है सलीक़े का
दाग़ देहलवी