Couplets Poetry (page 433)
बंद अहकाम-ए-अक़्ल में रहना
ख़्वाजा मीर 'दर्द'
बाग़-ए-जहाँ के गुल हैं या ख़ार हैं तो हम हैं
ख़्वाजा मीर 'दर्द'
अज़िय्यत मुसीबत मलामत बलाएँ
ख़्वाजा मीर 'दर्द'
अर्ज़-ओ-समा कहाँ तिरी वुसअत को पा सके
ख़्वाजा मीर 'दर्द'
आँखें भी हाए नज़अ में अपनी बदल गईं
ख़्वाजा मीर 'दर्द'
आगे ही बिन कहे तू कहे है नहीं नहीं
ख़्वाजा मीर 'दर्द'
शेल्फ़ पे उल्टा कर के रख दो और बिसरा दो
दानियाल तरीर
ख़्वाब का क्या है रात के नक़्श-ओ-निगार बनाओ
दानियाल तरीर
ख़्वाब का क्या है रात के नक़्श-ओ-निगार बनाओ
दानियाल तरीर
ख़्वाब जज़ीरा बन सकते थे नहीं बने
दानियाल तरीर
एक बे-चेहरा मुसाफ़िर रंग ओढ़े
दानियाल तरीर
देखना ये है कि जंगल को चलाने के लिए
दानियाल तरीर
दरिंदे साथ रहना चाहते हैं आदमी के
दानियाल तरीर
आख़िर जिस्म भी दीवारों को सौंप गए
दानियाल तरीर
ज़र्रे ज़र्रे में महक प्यार की डाली जाए
दानिश अलीगढ़ी
तेरे फ़िराक़ ने की ज़िंदगी अता मुझ को
दानिश अलीगढ़ी
रूदाद-ए-शब-ए-ग़म यूँ डरता हूँ सुनाने से
दानिश अलीगढ़ी
मुस्कुरा कर उन का मिलना और बिछड़ना रूठ कर
दानिश अलीगढ़ी
हो के मजबूर ये बच्चों को सबक़ देना है
दानिश अलीगढ़ी
गर तरन्नुम पर ही 'दानिश' मुनहसिर है शाइरी
दानिश अलीगढ़ी
अपने दुश्मन को भी ख़ुद बढ़ के लगा लो सीने
दानिश अलीगढ़ी
आख़िरी वक़्त तलक साथ अंधेरों ने दिया
दानिश अलीगढ़ी
इश्क़ की राहों में आया है इक ऐसा भी मक़ाम
दामोदर ठाकुर ज़की
एक दिन नक़्श-ए-क़दम पर मिरे बन जाएगी राह
दामोदर ठाकुर ज़की
ज़ीस्त से तंग हो ऐ 'दाग़' तो जीते क्यूँ हो
दाग़ देहलवी
ज़िक्र-ए-मेहर-ओ-वफ़ा तो हम करते
दाग़ देहलवी
ज़िद हर इक बात पर नहीं अच्छी
दाग़ देहलवी
ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं
दाग़ देहलवी
ज़माना दोस्ती पर इन हसीनों की न इतराए
दाग़ देहलवी
ज़ालिम ने क्या निकाली रफ़्तार रफ़्ता रफ़्ता
दाग़ देहलवी