Couplets Poetry (page 434)

यूँ मेरे साथ दफ़्न दिल-ए-बे-क़रार हो

दाग़ देहलवी

यूँ भी हज़ारों लाखों में तुम इंतिख़ाब हो

दाग़ देहलवी

ये तो नहीं कि तुम सा जहाँ में हसीं नहीं

दाग़ देहलवी

ये तो कहिए इस ख़ता की क्या सज़ा

दाग़ देहलवी

ये सैर है कि दुपट्टा उड़ा रही है हवा

दाग़ देहलवी

ये मज़ा था दिल-लगी का कि बराबर आग लगती

दाग़ देहलवी

ये गुस्ताख़ी ये छेड़ अच्छी नहीं है ऐ दिल-ए-नादाँ

दाग़ देहलवी

वो ज़माना भी तुम्हें याद है तुम कहते थे

दाग़ देहलवी

वो कहते हैं क्या ज़ोर उठाओगे तुम ऐ 'दाग़'

दाग़ देहलवी

वो जाते हैं आती है क़यामत की सहर आज

दाग़ देहलवी

वो जब चले तो क़यामत बपा थी चारों तरफ़

दाग़ देहलवी

वो दिन गए कि 'दाग़' थी हर दम बुतों की याद

दाग़ देहलवी

वाइज़ बड़ा मज़ा हो अगर यूँ अज़ाब हो

दाग़ देहलवी

वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे

दाग़ देहलवी

वादा झूटा कर लिया चलिए तसल्ली हो गई

दाग़ देहलवी

उज़्र उन की ज़बान से निकला

दाग़ देहलवी

उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं

दाग़ देहलवी

उर्दू है जिस का नाम हमीं जानते हैं 'दाग़'

दाग़ देहलवी

उन की फ़रमाइश नई दिन रात है

दाग़ देहलवी

उधर शर्म हाइल इधर ख़ौफ़ माने

दाग़ देहलवी

उड़ गई यूँ वफ़ा ज़माने से

दाग़ देहलवी

तुम को चाहा तो ख़ता क्या है बता दो मुझ को

दाग़ देहलवी

तुम को आशुफ़्ता-मिज़ाजों की ख़बर से क्या काम

दाग़ देहलवी

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था

दाग़ देहलवी

तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता

दाग़ देहलवी

तुम अगर अपनी गूँ के हो माशूक़

दाग़ देहलवी

ठोकर भी राह-ए-इश्क़ में खानी ज़रूर है

दाग़ देहलवी

तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं

दाग़ देहलवी

तदबीर से क़िस्मत की बुराई नहीं जाती

दाग़ देहलवी

तबीअ'त कोई दिन में भर जाएगी

दाग़ देहलवी