Couplets Poetry (page 472)
देखता हूँ उन की सूरत देख कर
अज़ीज़ हैदराबादी
दर्द सहने के लिए सदमे उठाने के लिए
अज़ीज़ हैदराबादी
दम-ए-तकल्लुम किसी के आगे हम अपने दिल को भी देते हौके
अज़ीज़ हैदराबादी
बहुत कुछ देखना है आगे आगे
अज़ीज़ हैदराबादी
अयाँ या निहाँ इक नज़र देख लेते
अज़ीज़ हैदराबादी
अभी कुछ है अभी कुछ है अभी कुछ
अज़ीज़ हैदराबादी
आराम अपने बस का है बस मैं नहीं है किया
अज़ीज़ हैदराबादी
आँखों में तिरी शक्ल है दिल में है तिरी याद
अज़ीज़ हैदराबादी
ज़हर का जाम ही दे ज़हर भी है आब-ए-हयात
अज़ीज़ हामिद मदनी
वो लोग जिन से तिरी बज़्म में थे हंगामे
अज़ीज़ हामिद मदनी
वक़्त ही वो ख़त-ए-फ़ासिल है कि ऐ हम-नफ़सो
अज़ीज़ हामिद मदनी
वफ़ा की रात कोई इत्तिफ़ाक़ थी लेकिन
अज़ीज़ हामिद मदनी
उन को ऐ नर्म हवा ख़्वाब-ए-जुनूँ से न जगा
अज़ीज़ हामिद मदनी
तिलिस्म-ए-शेवा-ए-याराँ खुला तो कुछ न हुआ
अज़ीज़ हामिद मदनी
तिलिस्म-ए-ख़्वाब-ए-ज़ुलेख़ा ओ दाम-ए-बर्दा-फ़रोश
अज़ीज़ हामिद मदनी
सुलग रहा है उफ़ुक़ बुझ रही है आतिश-ए-महर
अज़ीज़ हामिद मदनी
सुब्ह से चलते चलते आख़िर शाम हुई आवारा-ए-दिल
अज़ीज़ हामिद मदनी
शहर जिन के नाम से ज़िंदा था वो सब उठ गए
अज़ीज़ हामिद मदनी
सदियों में जा के बनता है आख़िर मिज़ाज-ए-दहर
अज़ीज़ हामिद मदनी
नरमी हवा की मौज-ए-तरब-ख़ेज़ अभी से है
अज़ीज़ हामिद मदनी
मुबहम से एक ख़्वाब की ताबीर का है शौक़
अज़ीज़ हामिद मदनी
मेरी वफ़ा है उस की उदासी का एक बाब
अज़ीज़ हामिद मदनी
मिरा चाक-ए-गिरेबाँ चाक-ए-दिल से मिलने वाला है
अज़ीज़ हामिद मदनी
माना कि ज़िंदगी में है ज़िद का भी एक मक़ाम
अज़ीज़ हामिद मदनी
महक में ज़हर की इक लहर भी ख़्वाबीदा रहती है
अज़ीज़ हामिद मदनी
कुछ अब के हम भी कहें उस की दास्तान-ए-विसाल
अज़ीज़ हामिद मदनी
ख़ूँ हुआ दिल कि पशीमान-ए-सदाक़त है वफ़ा
अज़ीज़ हामिद मदनी
खुला ये दिल पे कि तामीर-ए-बाम-ओ-दर है फ़रेब
अज़ीज़ हामिद मदनी
ख़ुदा का शुक्र है तू ने भी मान ली मिरी बात
अज़ीज़ हामिद मदनी
ख़लल-पज़ीर हुआ रब्त-ए-मेहर-ओ-माह में वक़्त
अज़ीज़ हामिद मदनी