Couplets Poetry (page 474)
दस बारा ग़ज़लियात जो रखता है जेब में
अज़ीज़ फ़ैसल
केबल पे एक शेल्फ़ से जल्दी में सीख कर
अज़ीज़ फ़ैसल
बेगम से कह रहा था ये कोई ख़ला-नवर्द
अज़ीज़ फ़ैसल
ऐसी ख़्वाहिश को समझता हूँ मैं बिल्कुल नेचुरल
अज़ीज़ फ़ैसल
ऐसे बंदों को जानता हूँ मैं
अज़ीज़ फ़ैसल
जैसे कोई रोता है गले प्यार से लग कर
अज़ीज़ एजाज़
हर एक के चेहरे पे है तशवीश नुमायाँ
अज़ीज़ एजाज़
ज़िंदगी के सारे मौसम आ के रुख़्सत हो गए
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
ज़िंदगी भर मैं खुली छत पे खड़ी भीगा की
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
ज़र्द चेहरों की किताबें भी हैं कितनी मक़्बूल
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
ज़मीन मोम की होती है मेरे क़दमों में
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
ये हौसला भी किसी रोज़ कर के देखूँगी
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
वो ये कह कह के जलाता था हमेशा मुझ को
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
वो मिरा साया मिरे पीछे लगा कर खो गया
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
वरक़ उलट दिया करता है बे-ख़याली में
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
वक़्त हाकिम है किसी रोज़ दिला ही देगा
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
वफ़ा के नाम पर पैरा किए कच्चे घड़े ले कर
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
उस ने चाहा था कि छुप जाए वो अपने अंदर
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
उस की हर बात समझ कर भी मैं अंजान रही
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
उम्र भर रास्ते घेरे रहे उस शख़्स का घर
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
तिश्नगी मेरी मुसल्लम है मगर जाने क्यूँ
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
टटोलता हुआ कुछ जिस्म ओ जान तक पहुँचा
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
तमाम उम्र किसी और नाम से मुझ को
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
सुनने वाले मिरा क़िस्सा तुझे क्या लगता है
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
शिव तो नहीं हम फिर भी हम ने दुनिया भर के ज़हर पिए
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
शहर ख़्वाबों का सुलगता रहा और शहर के लोग
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
पकड़ने वाले हैं सब ख़ेमे आग और बेहोश
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
निकल पड़े न कहीं अपनी आड़ से कोई
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मुझे कहाँ मिरे अंदर से वो निकालेगा
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मुझे चखते ही खो बैठा वो जन्नत अपने ख़्वाबों की
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा