Couplets Poetry (page 473)

काज़िब सहाफ़तों की बुझी राख के तले

अज़ीज़ हामिद मदनी

कह सकते तो अहवाल-ए-जहाँ तुम से ही कहते

अज़ीज़ हामिद मदनी

जो बात दिल में थी उस से नहीं कही हम ने

अज़ीज़ हामिद मदनी

जब आई साअत-ए-बे-ताब तेरी बे-लिबासी की

अज़ीज़ हामिद मदनी

हुस्न की शर्त-ए-वफ़ा जो ठहरी तेशा ओ संग-ए-गिराँ की बात

अज़ीज़ हामिद मदनी

ग़म-ए-हयात ओ ग़म-ए-दोस्त की कशाकश में

अज़ीज़ हामिद मदनी

गहरे सुर्ख़ गुलाब का अंधा बुलबुल साँप को क्या देखेगा

अज़ीज़ हामिद मदनी

एक तरफ़ रू-ए-जानाँ था जलती आँख में एक तरफ़

अज़ीज़ हामिद मदनी

दो गज़ ज़मीं फ़रेब-ए-वतन के लिए मिली

अज़ीज़ हामिद मदनी

दिलों की उक़्दा-कुशाई का वक़्त है कि नहीं

अज़ीज़ हामिद मदनी

बैठो जी का बोझ उतारें दोनों वक़्त यहीं मिलते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

बहार चाक-ए-गिरेबाँ में ठहर जाती है

अज़ीज़ हामिद मदनी

अलग सियासत-ए-दरबाँ से दिल में है इक बात

अज़ीज़ हामिद मदनी

ऐसी कोई ख़बर तो नहीं साकिनान-ए-शहर

अज़ीज़ हामिद मदनी

अभी तो कुछ लोग ज़िंदगी में हज़ार सायों का इक शजर हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

ये दिया मैसेज ट्वीटर पर फ़सादी शख़्स ने

अज़ीज़ फ़ैसल

वो तीस साल से है फ़क़त बीस साल की

अज़ीज़ फ़ैसल

वो साड़ी ज्यूलरी के तहाइफ़ पे थी ब-ज़िद

अज़ीज़ फ़ैसल

वो अफ़तारी से पहले चखते चखते

अज़ीज़ फ़ैसल

वे बालों में कलर लगवा चुका है

अज़ीज़ फ़ैसल

थका हारा निकल कर घर से अपने

अज़ीज़ फ़ैसल

न ये क़ानून काम आया था राँझे के ज़रा सा भी

अज़ीज़ फ़ैसल

मोअर्रिख़ लिख न दें सुक़रात मुझ को

अज़ीज़ फ़ैसल

मैं एक बोरी में लाया हूँ भर के मूँग-फली

अज़ीज़ फ़ैसल

कूदे हैं उस के सेहन में दो-चार शेर-दिल

अज़ीज़ फ़ैसल

कितनी मज़ाहिया है ये बोतल के जिन की बात

अज़ीज़ फ़ैसल

इश्क़ में ये तफ़रक़ा-बाज़ी बहुत मायूब है

अज़ीज़ फ़ैसल

है कामयाबी-ए-मर्दां में हाथ औरत का

अज़ीज़ फ़ैसल

दो ख़त ब-नाम-ए-ज़ौजा-ओ-जानाँ लिखे मगर

अज़ीज़ फ़ैसल

दे रहे हैं इस लिए जंगल में धरना जानवर

अज़ीज़ फ़ैसल