Couplets Poetry (page 475)
मेरी तस्वीर बनाने को जो हाथ उठता है
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मेरी ख़ल्वत में जहाँ गर्द जमी पाई गई
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मेरे हालात ने यूँ कर दिया पत्थर मुझ को
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मिरे अंदर से यूँ फेंकी किसी ने रौशनी मुझ पर
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मेरे अंदर कोई तकता रहा रस्ता उस का
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मेरे अंदर एक दस्तक सी कहीं होती रही
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मिरे अंदर ढंडोरा पीटता है कोई रह रह के
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मर के ख़ुद में दफ़्न हो जाऊँगी मैं भी एक दिन
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मैं ने ये सोच के बोए नहीं ख़्वाबों के दरख़्त
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मैं उस की धूप हूँ जो मेरा आफ़्ताब नहीं
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मैं उस के सामने उर्यां लगूँगी दुनिया को
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मैं शाख़-ए-सब्ज़ हूँ मुझ को उतार काग़ज़ पर
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मैं रौशनी हूँ तो मेरी पहुँच कहाँ तक है
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मैं फूट फूट के रोई मगर मिरे अंदर
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मैं किसी जन्म की यादों पे पड़ा पर्दा हूँ
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मैं किस ज़बान में उस को कहाँ तलाश करूँ
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मैं जब भी उस की उदासी से ऊब जाऊँगी
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मैं भी साहिल की तरह टूट के बह जाती हूँ
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मैं अपने जिस्म में रहती हूँ इस तकल्लुफ़ से
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मैं अपने आप से टकरा गई थी ख़ैर हुई
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
लगाए पीठ बैठी सोचती रहती थी मैं जिस से
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
कुरेदता है बहुत राख मेरे माज़ी की
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
कोई मौसम मेरी उम्मीदों को रास आया नहीं
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
किसी जनम में जो मेरा निशाँ मिला था उसे
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
ख़्वाब दरवाज़ों से दाख़िल नहीं होते लेकिन
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
कहने वाला ख़ुद तो सर तकिए पे रख कर सो गया
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
जिन को दीवार-ओ-दर भी ढक न सके
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
जब किसी रात कभी बैठ के मय-ख़ाने में
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
जाने कितने राज़ खुलें जिस दिन चेहरों की राख धुले
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
इस घर के चप्पे चप्पे पर छाप है रहने वाले की
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा