Couplets Poetry (page 476)

हम से ज़ियादा कौन समझता है ग़म की गहराई को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हम ने सारा जीवन बाँटी प्यार की दौलत लोगों में

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हम ने सब को मुफ़्लिस पा के तोड़ दिया दिल का कश्कोल

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हम मता-ए-दिल-ओ-जाँ ले के भला क्या जाएँ

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हम हैं एहसास के सैलाब-ज़दा साहिल पर

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हम ऐसे सूरमा हैं लड़ के जब हालात से पलटे

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हमें दी जाएगी फाँसी हमारे अपने जिस्मों में

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हमारी बेबसी शहरों की दीवारों पे चिपकी है

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

गए मौसम में मैं ने क्यूँ न काटी फ़स्ल ख़्वाबों की

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

फ़साना-दर-फ़साना फिर रही है ज़िंदगी जब से

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

इक वही खोल सका सातवाँ दर मुझ पे मगर

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

एक मुद्दत से ख़यालों में बसा है जो शख़्स

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

धूप मेरी सारी रंगीनी उड़ा ले जाएगी

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

चराग़ों ने हमारे साए लम्बे कर दिए इतने

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

चराग़ बन के जली थी मैं जिस की महफ़िल में

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

चमन पे बस न चला वर्ना ये चमन वाले

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

बुझा के रख गया है कौन मुझ को ताक़-ए-निस्याँ पर

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

बिछड़ के भीड़ में ख़ुद से हवासों का वो आलम था

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

अपनी हस्ती का कुछ एहसास तो हो जाए मुझे

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

अहमियत का मुझे अपनी भी तो अंदाज़ा है

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

आज कम-अज़-कम ख़्वाबों ही में मिल के पी लेते हैं, कल

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

आईना-ख़ाने में खींचे लिए जाता है मुझे

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ये अपनी बेबसी है या कि अपनी बे-हिसी यारो

अज़ीज़ अन्सारी

हमारी मुफ़्लिसी आवारगी पे तुम को हैरत क्यूँ

अज़ीज़ अन्सारी

अपने लिए ही मुश्किल है

अज़ीज़ अन्सारी

'शफ़क़' का रंग कितने वालेहाना-पन से बिखरा है

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

रात इक शख़्स बहुत याद आया

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

न जाने कौन अपाहिज बना रहा है हमें

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

बहुत दिनों से इधर उस को याद भी न किया

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

अंधेरा इतना है अब शहर के मुहाफ़िज़ को

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़