Couplets Poetry (page 478)

ये और बात कि आँधी हमारे बस में नहीं

अज़हर इनायती

ये अलग बात कि मैं नूह नहीं था लेकिन

अज़हर इनायती

वो ताज़ा-दम हैं नए शो'बदे दिखाते हुए

अज़हर इनायती

वो तड़प जाए इशारा कोई ऐसा देना

अज़हर इनायती

वो जिस के सेहन में कोई गुलाब खिल न सका

अज़हर इनायती

उन के भी अपने ख़्वाब थे अपनी ज़रूरतें

अज़हर इनायती

तारीख़ भी हूँ उतने बरस की मोअर्रिख़ो

अज़हर इनायती

शिकस्तगी में भी क्या शान है इमारत की

अज़हर इनायती

सँभल के चलने का सारा ग़ुरूर टूट गया

अज़हर इनायती

सब देख कर गुज़र गए इक पल में और हम

अज़हर इनायती

पुराने अहद में भी दुश्मनी थी

अज़हर इनायती

पलट चलें कि ग़लत आ गए हमीं शायद

अज़हर इनायती

नक़्श मिटते हैं तो आता है ख़याल

अज़हर इनायती

मुझ को भी जागने की अज़िय्यत से दे नजात

अज़हर इनायती

मेरी ख़ामोशी पे थे जो तअना-ज़न

अज़हर इनायती

मैं जिसे ढूँडने निकला था उसे पा न सका

अज़हर इनायती

लोग यूँ कहते हैं अपने क़िस्से

अज़हर इनायती

क्या रह गया है शहर में खंडरात के सिवा

अज़हर इनायती

किसी के ऐब छुपाना सवाब है लेकिन

अज़हर इनायती

ख़ुद-कुशी के लिए थोड़ा सा ये काफ़ी है मगर

अज़हर इनायती

करने को रौशनी के तआक़ुब का तजरबा

अज़हर इनायती

कभी क़रीब कभी दूर हो के रोते हैं

अज़हर इनायती

जवानों में तसादुम कैसे रुकता

अज़हर इनायती

जवान हो गई इक नस्ल सुनते सुनते ग़ज़ल

अज़हर इनायती

जहाँ ज़िदें किया करता था बचपना मेरा

अज़हर इनायती

इस रास्ते में जब कोई साया न पाएगा

अज़हर इनायती

इस कार-ए-आगही को जुनूँ कह रहे हैं लोग

अज़हर इनायती

हुआ उजाला तो हम उन के नाम भूल गए

अज़हर इनायती

हर एक रात को महताब देखने के लिए

अज़हर इनायती

हम-अस्रों में ये छेड़ चली आई है 'अज़हर'

अज़हर इनायती