Couplets Poetry (page 480)
इज़ाला हो गया ताख़ीर से निकलने का
अज़हर फ़राग़
हम अपनी नेकी समझते तो हैं तुझे लेकिन
अज़हर फ़राग़
हमारे ज़ाहिरी अहवाल पर न जा हम लोग
अज़हर फ़राग़
हाए वो भीगा रेशमी पैकर
अज़हर फ़राग़
गिरते पेड़ों की ज़द में हैं हम लोग
अज़हर फ़राग़
गीले बालों को सँभाल और निकल जंगल से
अज़हर फ़राग़
एक होने की क़स्में खाई जाएँ
अज़हर फ़राग़
एक ही वक़्त में प्यासे भी हैं सैराब भी हैं
अज़हर फ़राग़
दलील उस के दरीचे की पेश की मैं ने
अज़हर फ़राग़
भँवर से ये जो मुझे बादबान खींचता है
अज़हर फ़राग़
बता रहा है झटकना तिरी कलाई का
अज़हर फ़राग़
बहुत से साँप थे इस ग़ार के दहाने पर
अज़हर फ़राग़
बहुत ग़नीमत हैं हम से मिलने कभी कभी के ये आने वाले
अज़हर फ़राग़
बदल के देख चुकी है रेआया साहिब-ए-तख़्त
अज़हर फ़राग़
ऐसी ग़ुर्बत को ख़ुदा ग़ारत करे
अज़हर फ़राग़
अच्छे-ख़ासे लोगों पर भी वक़्त इक ऐसा आ जाता है
अज़हर फ़राग़
आँख खुलते ही जबीं चूमने आ जाते हैं
अज़हर फ़राग़
शाम परिंदे लौट आए तो हम तिरी खोज में चल निकले
अज़हर अली
ज़रा सी देर तुझे आइना दिखाया है
अज़हर अदीब
ये शख़्स जो तुझे आधा दिखाई देता है
अज़हर अदीब
उसी ने सब से पहले हार मानी
अज़हर अदीब
उसे बाम-ए-पज़ीराई पे कैसे छोड़ दूँ अब
अज़हर अदीब
तुम उस की बातों में न आना
अज़हर अदीब
सुब्ह कैसी है वहाँ शाम की रंगत क्या है
अज़हर अदीब
शब भर आँख में भीगा था
अज़हर अदीब
सारे मंज़र में समाया हुआ लगता है मुझे
अज़हर अदीब
समझ में आ तो सकती है सबा की गुफ़्तुगू भी
अज़हर अदीब
निकल आया हूँ आगे उस जगह से
अज़हर अदीब
मेरे हरे वजूद से पहचान उस की थी
अज़हर अदीब
मैं उस का नाम ले बैठा था इक दिन
अज़हर अदीब