Couplets Poetry (page 481)
मैं जिस लम्हे को ज़िंदा कर रहा हूँ मुद्दतों से
अज़हर अदीब
लोगो हम तो एक ही सूरत में हथियार उठाते हैं
अज़हर अदीब
लहजे और आवाज़ में रक्खा जाता है
अज़हर अदीब
कभी उस से दुआ की खेतियाँ सैराब करना
अज़हर अदीब
जो ज़िंदगी की माँग सजाते रहे सदा
अज़हर अदीब
जब भी चाहूँ तेरा चेहरा सोच सकूँ
अज़हर अदीब
इतना भी इंहिसार मिरे साए पर न कर
अज़हर अदीब
इस लिए मैं ने मुहाफ़िज़ नहीं रक्खे अपने
अज़हर अदीब
हम ने घर की सलामती के लिए
अज़हर अदीब
हम उन की आस पे उम्रें गुज़ार देते हैं
अज़हर अदीब
हवा को ज़िद कि उड़ाएगी धूल हर सूरत
अज़हर अदीब
हमें रोको नहीं हम ने बहुत से काम करने हैं
अज़हर अदीब
हमारे नाम की तख़्ती भी उन पे लग न सकी
अज़हर अदीब
ग़ज़ल उस के लिए कहते हैं लेकिन दर-हक़ीक़त हम
अज़हर अदीब
एक लम्हे को सही उस ने मुझे देखा तो है
अज़हर अदीब
दोनों हाथों से छुपा रक्खा है मुँह
अज़हर अदीब
देर लगती है बहुत लौट के आते आते
अज़हर अदीब
दश्त-ए-शब में पता ही नहीं चल सका
अज़हर अदीब
बे-ख़्वाबी कब छुप सकती है काजल से भी
अज़हर अदीब
ऐ शहर-ए-सितम छोड़ के जाते हुए लोगो
अज़हर अदीब
आज निकले याद की ज़म्बील से
अज़हर अदीब
हाथ पत्थर से हो गए मानूस
अज़हर अब्बास
टूटा तो अज़ीज़ और हुआ अहल-ए-वफ़ा को
अज़ीम मुर्तज़ा
कुछ नक़्श तिरी याद के बाक़ी हैं अभी तक
अज़ीम मुर्तज़ा
ख़ुलूस-ए-नियत-ए-रहबर पे मुनहसिर है 'अज़ीम'
अज़ीम मुर्तज़ा
हम दर्द के मारे ही गिराँ-जाँ हैं वगर्ना
अज़ीम मुर्तज़ा
इस तरह फूँक मेरा गुलिस्तान-ए-आरज़ू
आज़म चिश्ती
ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!! आ दो घड़ी मिल कर रहें
आज़ाद गुलाटी
ये मैं था या मिरे अंदर का ख़ौफ़ था जिस ने
आज़ाद गुलाटी
यादों की महफ़िल में खो कर
आज़ाद गुलाटी