Couplets Poetry (page 482)

वो वक़्त आएगा जब ख़ुद तुम्ही ये सोचोगी

आज़ाद गुलाटी

वक़्त का ये मोड़ कैसा है कि तुझ से मिल के भी

आज़ाद गुलाटी

उसे भी जाते हुए तुम ने मुझ से छीन लिया

आज़ाद गुलाटी

तुम्हें भी मुझ में न शायद वो पहली बात मिले

आज़ाद गुलाटी

शायद तुम भी अब न मुझे पहचान सको

आज़ाद गुलाटी

समेट लो मुझे अपनी सदा के हल्क़ों में

आज़ाद गुलाटी

समेट लाता हूँ मोती तुम्हारी यादों के

आज़ाद गुलाटी

साल-ए-नौ आता है तो महफ़ूज़ कर लेता हूँ मैं

आज़ाद गुलाटी

रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया

आज़ाद गुलाटी

फेंका था हम पे जो कभी उस को उठा के देख

आज़ाद गुलाटी

मैं साथ ले के चलूँगा तुम्हें ऐ हम-सफ़रो

आज़ाद गुलाटी

कुछ ऐसे फूल भी गुज़रे हैं मेरी नज़रों से

आज़ाद गुलाटी

किसे मिलती नजात 'आज़ाद' हस्ती के मसाइल से

आज़ाद गुलाटी

किस से पूछें रात-भर अपने भटकने का सबब

आज़ाद गुलाटी

हर इक ने देखा मुझे अपनी अपनी नज़रों से

आज़ाद गुलाटी

एक वो हैं कि जिन्हें अपनी ख़ुशी ले डूबी

आज़ाद गुलाटी

देखने वाले मुझे मेरी नज़र से देख ले

आज़ाद गुलाटी

दश्त-ए-ज़ुल्मात में हम-राह मिरे

आज़ाद गुलाटी

अपनी सारी काविशों को राएगाँ मैं ने किया

आज़ाद गुलाटी

आसमाँ एक सुलगता हुआ सहरा है जहाँ

आज़ाद गुलाटी

आप जिस रह-गुज़र-ए-दिल से कभी गुज़रे थे

आज़ाद गुलाटी

आज आईने में ख़ुद को देख कर याद आ गया

आज़ाद गुलाटी

वो काफ़िर-निगाहें ख़ुदा की पनाह

आज़ाद अंसारी

तलब-ए-आशिक़-ए-सादिक़ में असर होता है

आज़ाद अंसारी

सज़ाएँ तो हर हाल में लाज़मी थीं

आज़ाद अंसारी

किसे फ़ुर्सत कि फ़र्ज़-ए-ख़िदमत-ए-उल्फ़त बजा लाए

आज़ाद अंसारी

हम को न मिल सका तो फ़क़त इक सुकून-ए-दिल

आज़ाद अंसारी

दीदार की तलब के तरीक़ों से बे-ख़बर

आज़ाद अंसारी

बंदा-परवर मैं वो बंदा हूँ कि बहर-ए-बंदगी

आज़ाद अंसारी

अगर कार-ए-उल्फ़त को मुश्किल समझ लूँ

आज़ाद अंसारी