Couplets Poetry (page 483)

अफ़्सोस बे-शुमार सुख़न-हा-ए-ग़ुफतनी

आज़ाद अंसारी

शफ़क़ हूँ सूरज हूँ रौशनी हूँ

अय्यूब साबिर

कहा ये मैं ने भला कब कि मत सज़ा दीजे

अय्यूब साबिर

साँस लेता हूँ तो दम घुटता है

अय्यूब रूमानी

हम चाहते थे माह-ए-दरख़्शाँ को देखना

आएशा मसूद मलिक

यूँ भी मिली है मुझ को मिरे ज़ब्त-ए-ग़म की दाद

अयाज़ झाँसवी

ये रहबर आज भी कितने पुराने लगते हैं

अतुल अजनबी

सफ़र हो शाह का या क़ाफ़िला फ़क़ीरों का

अतुल अजनबी

पत्तों को छोड़ देता है अक्सर ख़िज़ाँ के वक़्त

अतुल अजनबी

किसी दरख़्त से सीखो सलीक़ा जीने का

अतुल अजनबी

अजब ख़ुलूस अजब सादगी से करता है

अतुल अजनबी

ज़रा से रिज़्क़ में बरकत भी कितनी होती थी

अतीक़ुल्लाह

ये राह-ए-तलब यारो गुमराह भी करती है

अतीक़ुल्लाह

ये देखा जाए वो कितने क़रीब आता है

अतीक़ुल्लाह

वो रात नींद की दहलीज़ पर तमाम हुई

अतीक़ुल्लाह

वो बात थी तो कई दूसरे सबब भी थे

अतीक़ुल्लाह

तुम ने तो फ़क़त उस की रिवायत ही सुनी है

अतीक़ुल्लाह

तिरे फ़लक ही से टूटने वाली रौशनी के हैं अक्स सारे

अतीक़ुल्लाह

सफ़र-गिरफ़्ता रहे कुश्तगान-ए-नान-ओ-नमक

अतीक़ुल्लाह

रेल की पटरी ने उस के टुकड़े टुकड़े कर दिए

अतीक़ुल्लाह

पानी था मगर अपने ही दरिया से जुदा था

अतीक़ुल्लाह

मुझ में ख़ुद मेरी अदम-मौजूदगी शामिल रही

अतीक़ुल्लाह

लम्स की शिद्दतें महफ़ूज़ कहाँ रहती हैं

अतीक़ुल्लाह

कुछ बदन की ज़बान कहती थी

अतीक़ुल्लाह

कोई शब ढूँडती थी मुझ को और मैं

अतीक़ुल्लाह

किसी इक ज़ख़्म के लब खुल गए थे

अतीक़ुल्लाह

किस के पैरों के नक़्श हैं मुझ में

अतीक़ुल्लाह

ख़्वाबों की किर्चियाँ मिरी मुट्ठी में भर न जाए

अतीक़ुल्लाह

कहाँ पहुँच के हदें सब तमाम होती हैं

अतीक़ुल्लाह

इस गली से उस गली तक दौड़ता रहता हूँ मैं

अतीक़ुल्लाह