Couplets Poetry (page 485)

हमारे इश्क़ में रुस्वा हुए तुम

अतहर नफ़ीस

इक शक्ल हमें फिर भाई है इक सूरत दिल में समाई है

अतहर नफ़ीस

इक आग ग़म-ए-तन्हाई की जो सारे बदन में फैल गई

अतहर नफ़ीस

दरवाज़ा खुला है कि कोई लौट न जाए

अतहर नफ़ीस

बा-वफ़ा था तो मुझे पूछने वाले भी न थे

अतहर नफ़ीस

बहुत छोटे हैं मुझ से मेरे दुश्मन

अतहर नफ़ीस

'अतहर' तुम ने इश्क़ किया कुछ तुम भी कहो क्या हाल हुआ

अतहर नफ़ीस

ऐ मुझ को फ़रेब देने वाले

अतहर नफ़ीस

आईना दूसरों की जानिब है

अतीया नियाज़ी

वो बात मुझ को तो दुश्नाम सी लगी है 'अतीक़'

अतीक़ असर

उठे जाते हैं दीदा-वर सभी आहिस्ता आहिस्ता

अतीक़ असर

क़रीब से न गुज़र इंतिज़ार बाक़ी रख

अतीक़ असर

मसर्रत और ग़म दोनों की कोई हद ज़रूरी है

अतीक़ असर

चुरा के लाए हैं कुछ लोग लफ़्ज़ के मोती

अतीक़ असर

शाम के धुँदलकों में डूबता है यूँ सूरज

अतीक़ अंज़र

मैं तुम से तर्क-ए-तअल्लुक की बात क्यूँ सोचूँ

अतीक़ अंज़र

कहीं बुझती है दिल की प्यास इक दो घूँट से 'अनज़र'

अतीक़ अंज़र

ग़म की बंद मुट्ठी में रेत सा मिरा जीवन

अतीक़ अंज़र

गाँव के परिंदे तुम को क्या पता बिदेसों में

अतीक़ अंज़र

दूर मुझ से रहते हैं सारे ग़म ज़माने के

अतीक़ अंज़र

बिछड़ते वक़्त अना दरमियान थी वर्ना

अतीक़ अंज़र

नवाज़ता था हमेशा वो ग़म की दौलत से

अतीक़ इलाहाबादी

मैं ने पूछा ये बता मुझ से बिछड़ने का तुझे

अतीक़ इलाहाबादी

होंटों पर इक बार सजा कर अपने होंट

अतीक़ इलाहाबादी

घर हमारा फूँक कर कल इक पड़ोसी ऐ 'अतीक़'

अतीक़ इलाहाबादी

देव परी के क़िस्से सुन कर

अतीक़ इलाहाबादी

'अतीक़' बुझता भी कैसे चराग़-ए-दिल मेरा

अतीक़ इलाहाबादी

कशिश कुछ ऐसी थी मिट्टी की बास में हम लोग

अताउर्रहमान क़ाज़ी

बिखर बिखर गया इक मौज-ए-राएगाँ की तरह

अताउर्रहमान क़ाज़ी

ये किस अज़ाब में उस ने फँसा दिया मुझ को

अताउल हक़ क़ासमी