Couplets Poetry (page 487)

वक़्त की सई-ए-मुसलसल कारगर होती गई

असरार-उल-हक़ मजाज़

तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाख़ुदा दुनिया

असरार-उल-हक़ मजाज़

तिरे माथे पे ये आँचल तो बहुत ही ख़ूब है लेकिन

असरार-उल-हक़ मजाज़

तस्कीन-ए-दिल-ए-महज़ूँ न हुई वो सई-ए-करम फ़रमा भी गए

असरार-उल-हक़ मजाज़

सब का तो मुदावा कर डाला अपना ही मुदावा कर न सके

असरार-उल-हक़ मजाज़

रूदाद-ए-ग़म-ए-उल्फ़त उन से हम क्या कहते क्यूँकर कहते

असरार-उल-हक़ मजाज़

रोएँ न अभी अहल-ए-नज़र हाल पे मेरे

असरार-उल-हक़ मजाज़

फिर मिरी आँख हो गई नमनाक

असरार-उल-हक़ मजाज़

फिर किसी के सामने चश्म-ए-तमन्ना झुक गई

असरार-उल-हक़ मजाज़

मुझ को ये आरज़ू वो उठाएँ नक़ाब ख़ुद

असरार-उल-हक़ मजाज़

मिरी बर्बादियों का हम-नशीनो

असरार-उल-हक़ मजाज़

क्यूँ जवानी की मुझे याद आई

असरार-उल-हक़ मजाज़

कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी

असरार-उल-हक़ मजाज़

कमाल-ए-इश्क़ है दीवाना हो गया हूँ मैं

असरार-उल-हक़ मजाज़

कब किया था इस दिल पर हुस्न ने करम इतना

असरार-उल-हक़ मजाज़

इज़्न-ए-ख़िराम लेते हुए आसमाँ से हम

असरार-उल-हक़ मजाज़

इश्क़ का ज़ौक़-ए-नज़ारा मुफ़्त में बदनाम है

असरार-उल-हक़ मजाज़

इस महफ़िल-ए-कैफ़-ओ-मस्ती में इस अंजुमन-ए-इरफ़ानी में

असरार-उल-हक़ मजाज़

हुस्न को शर्मसार करना ही

असरार-उल-हक़ मजाज़

हम अर्ज़-ए-वफ़ा भी कर न सके कुछ कह न सके कुछ सुन न सके

असरार-उल-हक़ मजाज़

हिन्दू चला गया न मुसलमाँ चला गया

असरार-उल-हक़ मजाज़

हिज्र में कैफ़-ए-इज़्तिराब न पूछ

असरार-उल-हक़ मजाज़

डुबो दी थी जहाँ तूफ़ाँ ने कश्ती

असरार-उल-हक़ मजाज़

दफ़्न कर सकता हूँ सीने में तुम्हारे राज़ को

असरार-उल-हक़ मजाज़

छुप गए वो साज़-ए-हस्ती छेड़ कर

असरार-उल-हक़ मजाज़

बताऊँ क्या तुझे ऐ हम-नशीं किस से मोहब्बत है

असरार-उल-हक़ मजाज़

बताऊँ क्या तुझे ऐ हम-नशीं किस से मोहब्बत है

असरार-उल-हक़ मजाज़

बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना

असरार-उल-हक़ मजाज़

ऐ शौक़-ए-नज़ारा क्या कहिए नज़रों में कोई सूरत ही नहीं

असरार-उल-हक़ मजाज़

आप की मख़्मूर आँखों की क़सम

असरार-उल-हक़ मजाज़