Couplets Poetry (page 486)

वो एक शख़्स कि मंज़िल भी रास्ता भी है

अताउल हक़ क़ासमी

उसे अब भूल जाने का इरादा कर लिया है

अताउल हक़ क़ासमी

लगता नहीं कि उस से मरासिम बहाल हों

अताउल हक़ क़ासमी

जिस की ख़ातिर मैं भुला बैठा था अपने आप को

अताउल हक़ क़ासमी

गुम हुआ जाता है कोई मंज़िलों की गर्द में

अताउल हक़ क़ासमी

दिलों से ख़ौफ़ निकलता नहीं अज़ाबों का

अताउल हक़ क़ासमी

आए हैं लोग रात की दहलीज़ फाँद कर

अताउल हक़ क़ासमी

यूँ मोहब्बत से न हम ख़ाना-ब-दोशों को बुला

अता तुराब

वो इक सुख़न ही हमारी सनद न बन जाए

अता तुराब

तूफ़ान-ए-बहर ख़ाक डराता मुझे 'तुराब'

अता तुराब

तराश और भी अपने तसव्वुर-ए-रब को

अता तुराब

क्या क्या न प्यास जागे मिरे दिल के दश्त में

अता तुराब

इश्क़ तो अपने लहू में ही सँवरता है सो हम

अता तुराब

हाँ तुझे भी तो मयस्सर नहीं तुझ सा कोई

अता तुराब

चाहिए क्या तुम्हें तोहफ़े में बता दो वर्ना

अता तुराब

वो क्या तलब थी तिरे जिस्म के उजाले की

अता शाद

दिलों के दर्द जगा ख़्वाहिशों के ख़्वाब सजा

अता शाद

दिल वो सहरा है जहाँ हसरत-ए-साया भी नहीं

अता शाद

दर्द की धूप में सहरा की तरह साथ रहे

अता शाद

ज़रूरत ढल गई रिश्ते में वर्ना

अता आबिदी

सब्र की हद भी तो कुछ होती है

अता आबिदी

सब ख़्वाब पुराने हैं हर चंद फ़साने हैं

अता आबिदी

कोई भी ख़ुश नहीं है इस ख़बर से

अता आबिदी

किसी के जिस्म-ओ-जाँ छलनी किसी के बाल-ओ-पर टूटे

अता आबिदी

ख़्वाब ही ख़्वाब की ताबीर हुआ तो जाना

अता आबिदी

अदब ही ज़िंदगी में जब न आया

अता आबिदी

आज भी 'प्रेम' के और 'कृष्ण' के अफ़्साने हैं

अता आबिदी

ये मेरे इश्क़ की मजबूरियाँ मआज़-अल्लाह

असरार-उल-हक़ मजाज़

ये आना कोई आना है कि बस रस्मन चले आए

असरार-उल-हक़ मजाज़

या तो किसी को जुरअत-ए-दीदार ही न हो

असरार-उल-हक़ मजाज़