Couplets Poetry (page 488)
ये साल तूल-ए-मसाफ़त से चूर चूर गया
असरार ज़ैदी
सुलग रहा हूँ ख़ुद अपनी ही आग में कब से
असरार ज़ैदी
मसरूफ़ हम भी अंजुमन-आराइयों में थे
असरार ज़ैदी
अनजाने लोगों को हर सू चलता फिरता देख रहा हूँ
असरार ज़ैदी
यही नहीं कि किसी याद ने मलूल किया
असलम महमूद
वो दर्द हूँ कोई चारा नहीं है जिस का कहीं
असलम महमूद
तेरे कूचे की हवा पूछे है अब हम से
असलम महमूद
तेग़-ए-नफ़स को बहुत नाज़ था रफ़्तार पर
असलम महमूद
तमाम उम्र जिसे मैं उबूर कर न सका
असलम महमूद
रुक गया आ के जहाँ क़ाफ़िला-ए-रंग-ओ-नशात
असलम महमूद
रात आती है तो ताक़ों में जलाते हैं चराग़
असलम महमूद
पाँव उस के भी नहीं उठते मिरे घर की तरफ़
असलम महमूद
मिरी कहानी रक़म हुई है हवा के औराक़-ए-मुंतशिर पर
असलम महमूद
मिरे शौक़-ए-सैर-ओ-सफ़र को अब नए इक जहाँ की नुमूद कर
असलम महमूद
मैं एक रेत का पैकर था और बिखर भी गया
असलम महमूद
ख़ता ये थी कि मैं आसानियों का तालिब था
असलम महमूद
कहाँ भटकती फिरेगी अँधेरी गलियों में
असलम महमूद
हम दिल से रहे तेज़ हवाओं के मुख़ालिफ़
असलम महमूद
गुज़रते जा रहे हैं क़ाफ़िले तू ही ज़रा रुक जा
असलम महमूद
देख आ कर कि तिरे हिज्र में भी ज़िंदा हैं
असलम महमूद
बे-रंग न वापस कर इक संग ही दे सर को
असलम महमूद
अब ये समझे कि अंधेरा भी ज़रूरी शय है
असलम महमूद
आ गया कौन ये आज उस के मुक़ाबिल 'असलम'
असलम महमूद
सिर्फ़ मेरे लिए नहीं रहना
असलम कोलसरी
क़रीब आ के भी इक शख़्स हो सका न मिरा
असलम कोलसरी
काँटे से भी निचोड़ ली ग़ैरों ने बू-ए-गुल
असलम कोलसरी
जब मैं उस के गाँव से बाहर निकला था
असलम कोलसरी
जाने किस लम्हा-ए-वहशी की तलब है कि फ़लक
असलम कोलसरी
ईद का दिन है सो कमरे में पड़ा हूँ 'असलम'
असलम कोलसरी
हमारी जीत हुई है कि दोनों हारे हैं
असलम कोलसरी