Couplets Poetry (page 490)

किसे कहें कि रिफ़ाक़त का दाग़ है दिल पर

असलम अंसारी

ख़फ़ा न हो कि तिरा हुस्न ही कुछ ऐसा था

असलम अंसारी

जू-ए-नग़्मात पे तस्वीर सी लर्ज़ां देखी

असलम अंसारी

जिसे दरपेश जुदाई हो उसे क्या मालूम

असलम अंसारी

जाने वाले को कहाँ रोक सका है कोई

असलम अंसारी

हम ने हर ख़्वाब को ताबीर अता की 'असलम'

असलम अंसारी

हम को पहचान कि ऐ बज़म-ए-चमन-ज़ार-ए-वजूद

असलम अंसारी

हमारे हाथ फ़क़त रेत के सदफ़ आए

असलम अंसारी

दीवार-ए-ख़स्तगी हूँ मुझे हाथ मत लगा

असलम अंसारी

शाम खुलती है तेरे आने से

आसिमा ताहिर

शहज़ादी के कानों में जो बात कही थी इक तू ने

आसिमा ताहिर

नहीं वो इतना भी पागल नहीं था

आसिमा ताहिर

मुझ को ख़्वाबों के बाग़ में ला कर

आसिमा ताहिर

मिरे वजूद के अंदर है इक क़दीम मकान

आसिमा ताहिर

ख़्वाब का इंतिज़ार ख़त्म हुआ

आसिमा ताहिर

ख़ुश्बू जैसी रात ने मेरा

आसिमा ताहिर

हम ने जब हाल-ए-दिल उन से अपना कहा

आसिमा ताहिर

डूबने की न तैरने की ख़बर

आसिमा ताहिर

चुभ रही है अँधेरी रात मुझे

आसिमा ताहिर

बाम-ओ-दर पर उतरने वाली धूप

आसिमा ताहिर

आइने पर तो है भरोसा मुझे

आसिमा ताहिर

ज़ाविया धूप ने कुछ ऐसा बनाया है कि हम

आसिम वास्ती

ये हम-सफ़र तो सभी अजनबी से लगते हैं

आसिम वास्ती

वक़्त बे-वक़्त झलकता है मिरी सूरत से

आसिम वास्ती

तुम्हारे साथ मिरे मुख़्तलिफ़ मरासिम हैं

आसिम वास्ती

तुम इस रस्ते में क्यूँ बारूद बोए जा रहे हो

आसिम वास्ती

तू मिरे पास जब नहीं होता

आसिम वास्ती

तेज़ इतना ही अगर चलना है तन्हा जाओ तुम

आसिम वास्ती

तिरी ज़मीन पे करता रहा हूँ मज़दूरी

आसिम वास्ती

सीखा न दुआओं में क़नाअत का सलीक़ा

आसिम वास्ती