Couplets Poetry (page 491)
नहीं वो शम-ए-मोहब्बत रही तो फिर 'आसिम'
आसिम वास्ती
मुझे ख़बर ही नहीं थी कि इश्क़ का आग़ाज़
आसिम वास्ती
मिरी ज़बान के मौसम बदलते रहते हैं
आसिम वास्ती
मैं इंहिमाक में ये किस मक़ाम तक पहुँचा
आसिम वास्ती
लोग कहते हैं कि वो शख़्स है ख़ुशबू जैसा
आसिम वास्ती
कुछ वो भी तबीअत का सुखी ऐसा नहीं है
आसिम वास्ती
किसी भी काम में लगता नहीं है दिल मेरा
आसिम वास्ती
ख़ुश्क रुत में इस जगह हम ने बनाया था मकान
आसिम वास्ती
कहीं कहीं तो ज़मीं आसमाँ से ऊँची है
आसिम वास्ती
इंतिहाई हसीन लगती है
आसिम वास्ती
हम अपने बाग़ के फूलों को नोच डालते हैं
आसिम वास्ती
होंटों को फूल आँख को बादा नहीं कहा
आसिम वास्ती
ग़लत-रवी को तिरी मैं ग़लत समझता हूँ
आसिम वास्ती
बना रखा है मंसूबा कई बरसों का तू ने
आसिम वास्ती
बदल गया है ज़माना बदल गई दुनिया
आसिम वास्ती
अजीब शोर मचाने लगे हैं सन्नाटे
आसिम वास्ती
अब यही सोचते रहते हैं बिछड़ कर तुझ से
आसिम वास्ती
ये न आने के बहाने हैं सभी वर्ना मियाँ
आसिफ़ुद्दौला
तेरे कूचे में नक़्श-ए-पा की तरह
आसिफ़ुद्दौला
फबा है रुख़ पे तिरे ख़ुश-नुमा सनम लेकिन
आसिफ़ुद्दौला
मिलते ही नज़र दिल को मिलाया नहीं जाता
आसिफ़ुद्दौला
कहता है बहुत कुछ वो मुझे चुपके ही चुपके
आसिफ़ुद्दौला
जिस घड़ी तेरे आस्ताँ से गए
आसिफ़ुद्दौला
इस अदा से मुझे सलाम किया
आसिफ़ुद्दौला
हम इश्क़ के बंदे हैं मज़हब से नहीं वाक़िफ़
आसिफ़ुद्दौला
फ़ाएदा क्या है नसीहत से फिरे हो नासेह
आसिफ़ुद्दौला
वो मेरे ख़्वाब ले के सिरहाने खड़ा रहा
अासिफ़ा निशात
बाज़ चेहरे बहुत हसीन सही
अासिफ़ा निशात
सीने के बीच 'साक़िब' ऐसा है मरना जीना
अासिफ़ साक़िब
समेट ले गए सब रहमतें कहाँ मेहमान
अासिफ़ साक़िब