Couplets Poetry (page 484)
हम ज़मीं की तरफ़ जब आए थे
अतीक़ुल्लाह
हर मंज़र के अंदर भी इक मंज़र है
अतीक़ुल्लाह
फ़ज़ा में हाथ तो उट्ठे थे एक साथ कई
अतीक़ुल्लाह
दिन के हंगामे जिला देते हैं मुझ को वर्ना
अतीक़ुल्लाह
बड़ी चीज़ है ये सुपुर्दगी का महीन पल
अतीक़ुल्लाह
अपने सूखे हुए गुल-दान का ग़म है मुझ को
अतीक़ुल्लाह
अभी तो काँटों-भरी झाड़ियों में अटका है
अतीक़ुल्लाह
आईना आईना तैरता कोई अक्स
अतीक़ुल्लाह
ये भी अच्छा है कि सहरा में बनाया है मकाँ
अतहर शाह ख़ान जैदी
यूँ तसव्वुर में दबे पाँव तिरी याद आई
अतहर राज़
हम गर्दिश-ए-गिर्दाब-ए-अलम से नहीं डरते
अतहर राज़
गिरती हुई दीवार का साया था तिरा साथ
अतहर राज़
यक़ीन बरसों का इम्कान कुछ दिनों का हूँ
अतहर नासिक
यहीं कहीं पे अदू ने पड़ाव डाला था
अतहर नासिक
सूरज लिहाफ़ ओढ़ के सोया तमाम रात
अतहर नासिक
न-जाने कौन सी मजबूरियाँ हैं जिन के लिए
अतहर नासिक
मैं उसे सुब्ह न जानूँ जो तिरे संग नहीं
अतहर नासिक
मैं पूछ लेता हूँ यारों से रत-जगों का सबब
अतहर नासिक
कितने मअनी रखता है ज़रा ग़ौर तो कर
अतहर नासिक
बनाना पड़ता है अपने बदन को छत अपनी
अतहर नासिक
ये धूप तो हर रुख़ से परेशाँ करेगी
अतहर नफ़ीस
वो दौर क़रीब आ रहा है
अतहर नफ़ीस
उस ने मिरी निगाह के सारे सुख़न समझ लिए
अतहर नफ़ीस
मैं तेरे क़रीब आते आते
अतहर नफ़ीस
लम्हों के अज़ाब सह रहा हूँ
अतहर नफ़ीस
किसी ना-ख़्वांदा बूढ़े की तरह ख़त उस का पढ़ता हूँ
अतहर नफ़ीस
ख़्वाबों के उफ़ुक़ पर तिरा चेहरा हो हमेशा
अतहर नफ़ीस
कभी साया है कभी धूप मुक़द्दर मेरा
अतहर नफ़ीस
जी न सकूँ मैं जिस के बग़ैर
अतहर नफ़ीस
इतने दिन के बाद तू आया है आज
अतहर नफ़ीस