Couplets Poetry (page 479)

ग़ज़ल का शेर तो होता है बस किसी के लिए

अज़हर इनायती

घर से किस तरह मैं निकलूँ कि ये मद्धम सा चराग़

अज़हर इनायती

चौराहों का तो हुस्न बढ़ा शहर के मगर

अज़हर इनायती

अपनी तस्वीर बनाओगे तो होगा एहसास

अज़हर इनायती

अजब जुनून है ये इंतिक़ाम का जज़्बा

अज़हर इनायती

अब मिरे ब'अद कोई सर भी नहीं होगा तुलू'अ

अज़हर इनायती

आज शहरों में हैं जितने ख़तरे

अज़हर इनायती

आज भी शाम-ए-ग़म! उदास न हो

अज़हर इनायती

ये नहीं देखते कितनी है रियाज़त किस की

अज़हर फ़राग़

ये लोग जा के कटी बोगियों में बैठ गए

अज़हर फ़राग़

ये ख़मोशी मिरी ख़मोशी है

अज़हर फ़राग़

ये कच्चे सेब चबाने में इतने सहल नहीं

अज़हर फ़राग़

ये जो रहते हैं बहुत मौज में शब भर हम लोग

अज़हर फ़राग़

ये ए'तिमाद भी मेरा दिया हुआ है तुम्हें

अज़हर फ़राग़

वो दस्तियाब हमें इस लिए नहीं होता

अज़हर फ़राग़

वस्ल के एक ही झोंके में

अज़हर फ़राग़

वैसे तो ईमान है मेरा उन बाँहों की गुंजाइश पर

अज़हर फ़राग़

उसे कहो जो बुलाता है गहरे पानी में

अज़हर फ़राग़

उस से हम पूछ थोड़ी सकते हैं

अज़हर फ़राग़

ठहरना भी मिरा जाना शुमार होने लगा

अज़हर फ़राग़

तेज़ आँधी में ये भी काफ़ी है

अज़हर फ़राग़

तेरी शर्तों पे ही करना है अगर तुझ को क़ुबूल

अज़हर फ़राग़

मेरी नुमू है तेरे तग़ाफ़ुल से वाबस्ता

अज़हर फ़राग़

मंज़र-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ है दम-ए-रुख़्सत-ए-ख़्वाब

अज़हर फ़राग़

मैं जानता हूँ मुझे मुझ से माँगने वाले

अज़हर फ़राग़

महसूस कर लिया था भँवर की थकान को

अज़हर फ़राग़

कुछ नहीं दे रहा सुझाई हमें

अज़हर फ़राग़

किसी बदन की सयाहत निढाल करती है

अज़हर फ़राग़

ख़ुद पर हराम समझा समर के हुसूल को

अज़हर फ़राग़

ख़तों को खोलती दीमक का शुक्रिया वर्ना

अज़हर फ़राग़