Couplets Poetry (page 470)
तह में दरिया-ए-मोहब्बत के थी क्या चीज़ 'अज़ीज़'
अज़ीज़ लखनवी
सुकून-ए-दिल नहीं जिस वक़्त से उस बज़्म में आए
अज़ीज़ लखनवी
सोज़-ए-ग़म से अश्क का एक एक क़तरा जल गया
अज़ीज़ लखनवी
शीशा-ए-दिल को यूँ न उठाओ
अज़ीज़ लखनवी
शम्अ' बुझ कर रह गई परवाना जल कर रह गया
अज़ीज़ लखनवी
सबक़ आ के गोर-ए-ग़रीबाँ से ले लो
अज़ीज़ लखनवी
क़त्ल और मुझ से सख़्त-जाँ का क़त्ल
अज़ीज़ लखनवी
क़फ़स में जी नहीं लगता है आह फिर भी मिरा
अज़ीज़ लखनवी
फूट निकला ज़हर सारे जिस्म में
अज़ीज़ लखनवी
पैदा वो बात कर कि तुझे रोएँ दूसरे
अज़ीज़ लखनवी
मुसीबत थी हमारे ही लिए क्यूँ
अज़ीज़ लखनवी
मुझ को का'बा में भी हमेशा शैख़
अज़ीज़ लखनवी
मिरे दहन में अगर आप की ज़बाँ होती
अज़ीज़ लखनवी
मंज़िल-ए-हस्ती में इक यूसुफ़ की थी मुझ को तलाश
अज़ीज़ लखनवी
माना कि बज़्म-ए-हुस्न के आदाब हैं बहुत
अज़ीज़ लखनवी
मैं तो हस्ती को समझता हूँ सरासर इक गुनाह
अज़ीज़ लखनवी
लुत्फ़-ए-बहार कुछ नहीं गो है वही बहार
अज़ीज़ लखनवी
ख़ुद चले आओ या बुला भेजो
अज़ीज़ लखनवी
कभी जन्नत कभी दोज़ख़ कभी का'बा कभी दैर
अज़ीज़ लखनवी
झूटे वादों पर थी अपनी ज़िंदगी
अज़ीज़ लखनवी
जब से ज़ुल्फ़ों का पड़ा है इस में अक्स
अज़ीज़ लखनवी
इतना भी बार-ए-ख़ातिर-ए-गुलशन न हो कोई
अज़ीज़ लखनवी
हुस्न-ए-आरास्ता क़ुदरत का अतिय्या है मगर
अज़ीज़ लखनवी
हिज्र की रात काटने वाले
अज़ीज़ लखनवी
हक़ारत से न देखो साकिनान-ए-ख़ाक की बस्ती
अज़ीज़ लखनवी
हमेशा तिनके ही चुनते गुज़र गई अपनी
अज़ीज़ लखनवी
हमेशा से मिज़ाज-ए-हुस्न में दिक़्क़त-पसंदी है
अज़ीज़ लखनवी
हाए क्या चीज़ थी जवानी भी
अज़ीज़ लखनवी
हादसात-ए-दहर में वाबस्ता-ए-अर्बाब-ए-दर्द
अज़ीज़ लखनवी
दुनिया का ख़ून दौर-ए-मोहब्बत में है सफ़ेद
अज़ीज़ लखनवी