Couplets Poetry (page 468)

न हाथ सूख के झड़ते हैं जिस्म से अपने

अज़लान शाह

मुझ को पहचान तू ऐ वक़्त मैं वो हूँ जो फ़क़त

अज़लान शाह

किसी के नाम पे नन्हे दिए जलाते हुए

अज़लान शाह

किस लिए इस से निकलने की दुआएँ माँगूँ

अज़लान शाह

कमाँ न तीर न तलवार अपनी होती है

अज़लान शाह

हारे हुए लोगों की कहानी की तरह हैं

अज़लान शाह

हार को जीत के इम्कान से बाँधे हुए रख

अज़लान शाह

एड़ियाँ मार के ज़ख़्मी भी हुए लोग मगर

अज़लान शाह

चुपके से गुज़रते हैं ख़बर भी नहीं होती

अज़लान शाह

चंद क़दमों से ज़ियादा नहीं चलने पाते

अज़लान शाह

ज़मीर बेचने वाले वो तेरा सौदा-गर

अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी

ये बात सच है कि मरना सभी को है लेकिन

अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी

शायद यही किताब-ए-मोहब्बत हो ला-जवाब

अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी

शहर हो दश्त-ए-तमन्ना हो कि दरिया का सफ़र

अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी

न जाने कौन सी मंज़िल पे इश्क़ आ पहुँचा

अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी

डूबा सफ़ीना जिस में मुसाफ़िर कोई न था

अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी

तुम्हारी ज़ात से मंसूब है दीवानगी मेरी

अज़ीज़ वारसी

तुम पे इल्ज़ाम न आ जाए सफ़र में कोई

अज़ीज़ वारसी

तिरी महफ़िल में फ़र्क़-ए-कुफ़्र-ओ-ईमाँ कौन देखेगा

अज़ीज़ वारसी

मुझ से ये पूछ रहे हैं मिरे अहबाब 'अज़ीज़'

अज़ीज़ वारसी

मोहतसिब आओ चलें आज तो मय-ख़ाने में

अज़ीज़ वारसी

मोहब्बत लफ़्ज़ तो सादा सा है लेकिन 'अज़ीज़' इस को

अज़ीज़ वारसी

मिरी तक़दीर से पहले सँवरना जिन का मुश्किल है

अज़ीज़ वारसी

ख़ुशी महसूस करता हूँ न ग़म महसूस करता हूँ

अज़ीज़ वारसी

कैसे मुमकिन है कि हम दोनों बिछड़ जाएँगे

अज़ीज़ वारसी

जहाँ में हम जिसे भी प्यार के क़ाबिल समझते हैं

अज़ीज़ वारसी

ग़म-ए-उक़्बा ग़म-ए-दौराँ ग़म-ए-हस्ती की क़सम

अज़ीज़ वारसी

इक वक़्त था कि दिल को सुकूँ की तलाश थी

अज़ीज़ वारसी

दिल में अब कुछ भी नहीं उन की मोहब्बत के सिवा

अज़ीज़ वारसी

ये ग़म नहीं कि मुझ को जागना पड़ा है उम्र भर

अज़ीज़ तमन्नाई